उदयपुर नगर निगम चुनाव: 30 साल में 6 बार भाजपा का कब्जा, हर बार ज्यादा पार्षद जिताने में रही आगे
उदयपुर नगर निगम चुनाव में इस बार भी भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला देखने को मिल रहा है। हालांकि, अगर पिछले चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो शहर की सियासत में भाजपा का दबदबा साफ दिखाई देता है। पिछले 30 साल में उदयपुर नगर निगम में 6 बार भाजपा का मुखिया बना है।खास बात यह है कि इन तीन दशकों में जिन भी चुनावों में भाजपा ने निगम की सत्ता संभाली, वहां उसके जीतने वाले पार्षदों की संख्या भी कांग्रेस और अन्य दलों के मुकाबले ज्यादा रही।
उदयपुर निगम में भाजपा की मजबूत पकड़
उदयपुर में नगर निगम की राजनीति लंबे समय से भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिनी जाती रही है। पार्टी ने लगातार अपने संगठन और स्थानीय स्तर के नेटवर्क के दम पर चुनावों में बेहतर प्रदर्शन किया है।नगर निगम की सत्ता तक पहुंचने के लिए पार्षदों की संख्या सबसे अहम होती है और भाजपा अधिकतर चुनावों में इस मोर्चे पर आगे रही है।
छह बार बना भाजपा का बोर्ड
पिछले 30 वर्षों के दौरान उदयपुर नगर निगम में छह बार भाजपा समर्थित बोर्ड बना। इस दौरान भाजपा ने न केवल महापौर पद पर कब्जा जमाया, बल्कि बड़ी संख्या में अपने पार्षद जिताने में भी सफल रही।राजनीतिक जानकारों के अनुसार, भाजपा की मजबूती के पीछे शहर में उसका पारंपरिक वोट बैंक, मजबूत बूथ प्रबंधन और स्थानीय मुद्दों पर पकड़ प्रमुख कारण रहे हैं।
कांग्रेस के लिए चुनौती
वहीं, कांग्रेस लगातार उदयपुर में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करती रही है। पार्टी स्थानीय समस्याओं, विकास कार्यों और जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर चुनाव मैदान में उतरती है।लेकिन पिछले चुनावी आंकड़ों में भाजपा की बढ़त कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती रही है।
इस बार भी मुकाबला रोचक
आगामी नगर निगम चुनाव में भाजपा अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने की कोशिश में है, जबकि कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए जोर लगा रही है।शहर के मतदाताओं के लिए सड़क, सफाई, पेयजल, यातायात, सीवरेज और पर्यटन से जुड़े विकास जैसे मुद्दे अहम रहेंगे। अब देखना होगा कि उदयपुर की जनता इस बार भी भाजपा को मौका देती है या फिर राजनीतिक बदलाव का फैसला करती है।
