उदयपुर में वसीयत के बावजूद 5 साल तक नहीं मिली FD की रकम, बैंक ऑफ बड़ौदा के खिलाफ मामला
उदयपुर में मां की रजिस्टर्ड वसीयत होने के बावजूद बेटे को फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की रकम का भुगतान नहीं करना बैंक ऑफ बड़ौदा को भारी पड़ गया। बैंक ने वसीयत का अदालती प्रमाण यानी प्रोबेट ऑफ विल पेश करने की शर्त लगाकर करीब पांच साल तक भुगतान रोके रखा। इस मामले में बैंक की कार्रवाई को लेकर विवाद सामने आया है।
रजिस्टर्ड वसीयत के बाद भी अटका रहा भुगतान
मामले के अनुसार, एक महिला ने अपने पीछे छोड़ी गई संपत्ति के संबंध में रजिस्टर्ड वसीयत बनाई थी। महिला की मृत्यु के बाद उसके बेटे ने वसीयत के आधार पर बैंक में जमा फिक्स्ड डिपॉजिट की रकम प्राप्त करने की प्रक्रिया शुरू की।
हालांकि, बैंक ऑफ बड़ौदा ने रकम जारी करने से पहले वसीयत का प्रोबेट पेश करने की शर्त रख दी। इसके चलते बेटे को अपनी मां की FD की रकम प्राप्त करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भुगतान करीब पांच साल तक अटका रहा।
क्या होता है प्रोबेट ऑफ विल?
प्रोबेट ऑफ विल अदालत की ओर से जारी किया जाने वाला प्रमाण होता है, जिसके जरिए वसीयत की वैधता को प्रमाणित किया जाता है। हालांकि, हर मामले में प्रोबेट अनिवार्य हो, ऐसा नहीं है। इसकी आवश्यकता संबंधित कानून, वसीयत और संपत्ति की परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
बैंक आमतौर पर मृत खाताधारक की जमा राशि का भुगतान करने से पहले उत्तराधिकारी की पहचान और उसके दावे से जुड़े दस्तावेजों की जांच करते हैं। लेकिन किसी मामले में प्रोबेट की मांग उचित थी या नहीं, यह संबंधित कानूनी प्रावधानों और मामले के तथ्यों के आधार पर तय होता है।
मामले में आगे क्या हुआ?
इस मामले में बैंक की ओर से प्रोबेट की शर्त लगाए जाने और लंबे समय तक भुगतान रोके रखने का मुद्दा सामने आया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं है कि मामला किस मंच पर पहुंचा, किस प्राधिकरण या अदालत ने फैसला सुनाया और बैंक पर क्या आदेश या जुर्माना लगाया गया।
इसी तरह FD की कुल रकम, संबंधित महिला और उसके बेटे का नाम तथा बैंक की ओर से दी गई विस्तृत सफाई की जानकारी भी उपलब्ध नहीं है। इन तथ्यों के सामने आने के बाद ही मामले के कानूनी नतीजे और बैंक की जवाबदेही के बारे में स्पष्ट रूप से बताया जा सकेगा।
