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उदयपुर में 30 साल में 6 बार भाजपा का मुखिया बना: डेढ़ लाख से ज्यादा मतदाता तय करेंगे रिजल्ट, पढ़िए BJP-कांग्रेस के उम्मीदवारों की पूरी प्रोफाइल

 
उदयपुर में 30 साल में 6 बार भाजपा का मुखिया बना: डेढ़ लाख से ज्यादा मतदाता तय करेंगे रिजल्ट, पढ़िए BJP-कांग्रेस के उम्मीदवारों की पूरी प्रोफाइल

उदयपुर नगर निगम चुनाव में आज शहर की सियासत का फैसला होने जा रहा है। झीलों की नगरी में नगर निगम की सत्ता को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला माना जा रहा है। पिछले करीब तीन दशक के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो बीजेपी ने कई बार नगर निगम की कमान संभाली है। अब एक बार फिर दोनों प्रमुख दलों की प्रतिष्ठा दांव पर है।

उदयपुर समेत राजस्थान के छह प्रमुख नगर निगमों में 11 सितंबर को दूसरे चरण का मतदान हो रहा है। राज्य के इस चरण में 87.60 लाख से अधिक मतदाता 18,266 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे।

30 साल में छह बार बीजेपी का मुखिया

उदयपुर की स्थानीय राजनीति में बीजेपी लंबे समय से मजबूत स्थिति में रही है। करीब 30 साल के नगर निकाय इतिहास में छह बार बीजेपी का मुखिया बनने का दावा किया जाता है। यही वजह है कि इस चुनाव में पार्टी अपनी पुरानी पकड़ बरकरार रखने की कोशिश कर रही है।

वहीं कांग्रेस के सामने बीजेपी के इस प्रभाव को चुनौती देने की बड़ी जिम्मेदारी है। कांग्रेस स्थानीय मुद्दों, शहर की नागरिक सुविधाओं और सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दा बनाकर मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है।

डेढ़ लाख से ज्यादा मतदाता तय करेंगे किसकी सरकार

उदयपुर नगर निगम के चुनाव में बड़ी संख्या में मतदाता अपने वार्ड के पार्षद चुन रहे हैं। इनमें युवा मतदाताओं की भूमिका खास मानी जा रही है। पहली बार मतदान करने वाले और युवा वोटर कई वार्डों में चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।

युवाओं के बीच रोजगार, सड़क, ट्रैफिक, सफाई, स्ट्रीट लाइट, खेल सुविधाएं और डिजिटल सेवाएं जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। वहीं पुराने शहर के इलाकों में पानी, सीवरेज, सफाई और अतिक्रमण जैसे स्थानीय मुद्दे भी चुनावी चर्चा के केंद्र में हैं।

बीजेपी के सामने पुराना प्रदर्शन दोहराने की चुनौती

बीजेपी के उम्मीदवार अपने संगठन, पुराने जनाधार और केंद्र-राज्य सरकार की योजनाओं को आधार बनाकर वोट मांग रहे हैं। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग वार्डों में बागियों और स्थानीय असंतोष को नियंत्रित करने की है।

बीजेपी का जोर बूथ स्तर के संगठन और कार्यकर्ताओं के नेटवर्क पर भी है। पार्टी को उम्मीद है कि स्थानीय समीकरणों के साथ सरकार के कामकाज का फायदा भी उम्मीदवारों को मिलेगा।

कांग्रेस के लिए वापसी का मौका

कांग्रेस इस चुनाव को उदयपुर में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के मौके के तौर पर देख रही है। पार्टी के उम्मीदवार स्थानीय समस्याओं को प्रमुखता से उठाकर मतदाताओं के बीच पहुंच रहे हैं।

कांग्रेस के सामने टिकट वितरण के बाद नाराज कार्यकर्ताओं और बागी उम्मीदवारों को संभालने की चुनौती भी है। कई वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवार मुकाबले को त्रिकोणीय या बहुकोणीय बना सकते हैं।

किसके हाथ आएगी शहर की कमान?

उदयपुर नगर निगम चुनाव का परिणाम केवल पार्षदों की संख्या तय नहीं करेगा, बल्कि शहर की राजनीतिक दिशा भी तय करेगा। बीजेपी जहां अपने पुराने दबदबे को बनाए रखने की कोशिश कर रही है, वहीं कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए जोर लगा रही है।

अब नजर इस बात पर है कि युवा और पहली बार मतदान करने वाले मतदाता किसके पक्ष में जाते हैं। साथ ही वार्ड स्तर के स्थानीय समीकरण, निर्दलीय उम्मीदवार और बागियों का प्रदर्शन भी नतीजों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। आज का मतदान उदयपुर की अगली नगर सरकार की तस्वीर साफ करने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।