सीकर में फिर शुरू होगी 118 साल पुरानी लाइब्रेरी, वीडियो में देखें बड़ी खबर

सीकर न्यूज़ डेस्क , सीकर में 118 साल पुरानी लाइब्रेरी वापस शुरू होने वाली है। केवल दो कर्मचारियों का वेतन अटकने के कारण यह 28 साल से बंद थी। कोर्ट में मामला चल रहा था और नीलामी की तैयारी थी। इस बीच भामाशाह (हार्ट स्पेशलिस्ट) ने कर्मचारियों का वेतन देकर इस मामले को सुलझा दिया। नव गठित ट्रस्ट इसका नए सिरे से संचालन करेगा।अब यहां हजारों किताबों और हस्तलिखित ग्रन्थों को सहेज कर रखा जाएगा। नया पुस्तकालय पूरी तरह आधुनिक सुविधाओं से लैस व डिजिटल होगा। इस लाइब्रेरी में पूर्व राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद, पूर्व मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया व सांसद सेठ गोविंद दास सहित कई नामी हस्तियां यहां आ चुकी हैं।
1907 से हो रहा संचालित
इतिहासकार महावीर पुरोहित ने बताया- राव राजा माधो सिंह ने 1907 में सीकर शहर के बीच स्थित जाट बाजार में महावीर लाइब्रेरी की स्थापना की थी। पहले राजा-महाराजाओं की ओर से लाइब्रेरी को चलाने के लिए राशि निर्धारित की गई थी। जिसके बाद शिक्षा निदेशालय से भी ट्रस्ट को अनुदान मिलने लगा। शिक्षा निदेशालय ने यहां 2 कर्मचारियों को नियुक्त किया था।
लाइब्रेरी के दो कर्मचारियों ने वेतन के लिए लड़ी लड़ाई
लाइब्रेरी में तत्कालीन पुस्तकालय अध्यक्ष लालचंद शर्मा 1987 से और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी सुरेश टेलर 1993 से कार्यरत थे। दोनों कर्मचारियों को 1995 तक वेतन मिला था। महावीर लाइब्रेरी को 1995-96 तक सरकारी अनुदान मिला। इसके बाद अनुदान नहीं मिलने और कर्मचारियों को वेतन नहीं मिलने के कारण लगातार विवाद बढ़ता गया।मामला कोर्ट तक पहुंच गया। इस दौरान लाइब्रेरी में भी पाठक आना बंद हो गए। अलमारियों में पड़ी किताब धूल फांकने लगी। केवल ये दोनों कर्मचारी हर दिन यहां आते और अपने खर्च पर इसकी सार-संभाल करते थे।
कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की
ट्रिब्यूनल कोर्ट ने 17 जनवरी 1998 को ट्रस्ट को तत्कालीन पुस्तकालय अध्यक्ष लालचंद शर्मा को 2 महीने में वेतन देने और ऐसा नहीं करने पर भुगतान की तिथि तक 12 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया था। इसके साथ ही माध्यमिक शिक्षा निदेशालय को भी ट्रस्ट की बजाय अनुदान राशि सीधे कर्मचारियों को देने के निर्देश दिए थे। लेकिन ट्रस्ट ने इसकी पालना नहीं की। जिसके बाद कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की।
सिविल कोर्ट ने लाइब्रेरी नीलामी का दिया था आदेश
इस दौरान गहलोत सरकार के समय शिक्षा अधिनियम में संशोधन होने पर मामला 2004 में सिविल कोर्ट में आ गया। 2015 में देवस्थान विभाग व माधव सेवा समिति ने भी लाइब्रेरी पर अपना दावा पेश किया। कोर्ट ने इन याचिकाओं को दर किनार करते हुए अक्टूबर 2023 में लाइब्रेरी सचिव को 3 महीने में दोनों कर्मचारियों का बकाया वेतन देने और ऐसा नहीं करने पर लाइब्रेरी की नीलामी का आदेश दिया था।सिविल कोर्ट की ओर से लाइब्रेरी की नीलामी की तारीख 13, 14 व 15 मई 2024 तय की गई थी। महावीर लाइब्रेरी भवन के बाहर नीलामी के पोस्टर और बैनर भी चस्पा कर दिए गए थे। दो कर्मचारियों के सिर्फ 5.49 लाख के लिए लाइब्रेरी की शुरुआती बोली 1 करोड़ 56 लाख 8 हजार 682 रुपए तय की गई थी। खास बात रही कि इस बोली में शहर के किसी भी नागरिक ने भाग नहीं लिया। प्राचीन लाइब्रेरी की नीलामी की सूचना के बाद शहर के लोगों में आक्रोश भी था।
भामाशाह के कारण सुलझा विवाद
शहर के कई गणमान्य लोग इस प्राचीन धरोहर को कुर्क होने की कवायद में जुट गए। इसके बाद शहर के भामाशाह डॉ.वीके जैन ने दोनों कर्मचारियों को कोर्ट में पैसे देकर लाइब्रेरी को नीलामी होने से बचा लिया। वीके जैन की ओर से 15 लाख रुपए वेतन देने के बाद कोर्ट ने विवाद खत्म कर संस्था की चाबी उन्हें सौंप दी। अब नई कार्यकारिणी के गठन के साथ लाइब्रेरी को नए स्वरूप में फिर से संचालित करना तय किया गया है।
पूर्व राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद भी आए थे
महावीर लाइब्रेरी शहर की ऐतिहासिक धरोहर रहा है। इसमें 13 हजार बुक और 383 हस्तलिखित ग्रंथ हैं, जो धूल फांक रहे है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद भी 1996 में इलाज के लिए सीकर आए तो उन्होंने यहां की किताबें पढ़ी थी। इसी तरह प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया व सांसद सेठ गोविंद दास, जैसी कई हस्तियां भी इसका लाभ ले चुकी है।