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राजस्थान में अनोखी पहल: मंदिरों के चढ़ावे से बनेगी ऑर्गेनिक खाद, फूलों का होगा पुनः उपयोग

 
राजस्थान में अनोखी पहल: मंदिरों के चढ़ावे से बनेगी ऑर्गेनिक खाद, फूलों का होगा पुनः उपयोग

राजस्थान में पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता की दिशा में एक महत्वपूर्ण और अनोखी पहल की शुरुआत होने जा रही है। राज्य में पहली बार प्रमुख मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाने वाले फूल और फूलमालाओं को अब कचरे के रूप में फेंकने के बजाय ऑर्गेनिक खाद में बदला जाएगा।

इस योजना के तहत मंदिरों से एकत्र किए गए फूलों को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस कर जैविक खाद (Organic Compost) तैयार की जाएगी, जिसका उपयोग खेती और बागवानी में किया जाएगा। इससे न केवल पर्यावरण प्रदूषण में कमी आएगी, बल्कि किसानों को सस्ती और प्राकृतिक खाद भी उपलब्ध हो सकेगी।

अधिकारियों के अनुसार इस पहल की शुरुआत राज्य के प्रमुख धार्मिक स्थलों से की जाएगी, जहां प्रतिदिन बड़ी मात्रा में फूल और माला चढ़ाई जाती हैं। अभी तक इन फूलों को नदियों या कचरे के रूप में नष्ट कर दिया जाता था, जिससे पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता था। अब इन्हें एक उपयोगी संसाधन में बदलने की दिशा में कदम उठाया गया है।

यह योजना राजस्थान सरकार के स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण अभियान के तहत लागू की जा रही है। इसके लिए स्थानीय निकायों और पर्यावरण विभाग को मिलकर कार्य करने के निर्देश दिए गए हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि मंदिरों से निकलने वाले फूलों में प्राकृतिक तत्व अधिक होते हैं, जिन्हें आसानी से कंपोस्ट में बदला जा सकता है। इस प्रक्रिया से तैयार खाद पूरी तरह जैविक होगी और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद करेगी।

इस पहल से न केवल पर्यावरण को लाभ मिलेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। फूलों के संग्रह, प्रोसेसिंग और खाद निर्माण इकाइयों के संचालन के लिए लोगों को रोजगार मिल सकता है।

स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह एक सकारात्मक बदलाव है, जो धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ता है।

अधिकारियों ने बताया कि यदि यह योजना सफल रहती है, तो इसे पूरे राज्य के अन्य मंदिरों और धार्मिक स्थलों तक विस्तारित किया जाएगा। इसके लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जा रही है।

कुल मिलाकर, यह पहल राजस्थान में धार्मिक परंपराओं को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हुए एक स्थायी विकास मॉडल की ओर महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।