प्रतापगढ़ में मौजूद है दुनिया का पहला मंदिर जहाँ देवी को चढ़ाई जाती है हथकड़ी और बेडियां वजह जानकर आपके भी उड़ जाएंगे होश
प्रतापगढ़ न्यूज़ डेस्क - राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में एक अनोखा मंदिर है, जहां भक्त सुहाग की सामग्री और भोग के साथ बेड़ियां और हथकड़ी भी चढ़ाते हैं। हम बात कर रहे हैं अरावली पर्वत श्रृंखला और घने जंगल के बीच 500 मीटर ऊंची पहाड़ी पर बने दिवाक माता मंदिर की।
इस मान्यता के पीछे एक रोचक कहानी
प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर जोलर गांव में स्थित इस मंदिर में आने वाले भक्त दिवाक माता को प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह के जतन करते हैं। यहां प्रसाद के साथ देवी को सिर्फ सुहाग की सामग्री ही नहीं बल्कि हथकड़ी और बेड़ियां भी चढ़ाई जाती हैं। मंदिर के प्रांगण में गड़े त्रिशूल पर कई हथकड़ियां रखी हैं, जो सालों पुरानी हैं।इस मान्यता के पीछे एक रोचक कहानी है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में मालवा-मेवाड़ क्षेत्र में डाकुओं का राज था। डाकू यहां मन्नत मांगते थे कि अगर वे अपना काम करते हुए पुलिस के चंगुल से बच निकले तो वे यहां हथकड़ी और बेड़ियां चढ़ाएंगे।
एक किंवदंती यह भी है कि रियासत काल में डाकू पृथ्वी राणा ने जेल में दिवाक माता से मन्नत मांगी थी कि अगर वह जेल से छूटकर बाहर आया तो सीधे यहां दर्शन करने आएगा। बाद में वह जेल से भाग निकला और मन्नत पूरी करने के लिए सीधे इस मंदिर में आया। कई भक्त जो किसी न किसी आरोप में कोर्ट जाते हैं, वे यहां आकर माता से मन्नत मांगते हैं और मन्नत पूरी होने पर बेड़ियां और हथकड़ी चढ़ाते हैं।
200 साल पुराने त्रिशूल पर लोग चढ़ाते हैं हथकड़ी
कई लोगों ने अपने दुखों से मुक्ति पाने के लिए इस तरह बेड़ियां और हथकड़ी चढ़ाना भी शुरू कर दिया और यह एक परंपरा बन गई। इस मंदिर के प्रांगण में 200 साल पुराना त्रिशूल बना हुआ है। लोग इस त्रिशूल पर मन्नत मांगते हुए हथकड़ी चढ़ाते हैं।
जंगल से पेड़ नहीं काटे जाते
मंदिर के चारों ओर घना जंगल है। छोटी-बड़ी पहाड़ियों और ऊंची-नीची जगहों को पार करके यहां पैदल पहुंचा जा सकता है। मंदिर के प्रति श्रद्धा के कारण इस क्षेत्र में कोई पेड़ नहीं काटा जाता।
