उस्ताद अमीर खां : तीन उस्तादों की तीन खूबियां लेकर बनाई अलग शैली, ऐसे बने इंदौर घराने के जनक
मुंबई, 14 अगस्त (आईएएनएस)। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में उस्ताद अमीर खां का राग को पेश करने का अंदाज बिल्कुल अलग था। यही वजह है कि आगे चलकर उनकी गायकी की अलग पहचान बनी। खास बात यह थी कि उन्होंने किसी एक संगीत शैली की नकल नहीं की, बल्कि अलग-अलग बड़े उस्तादों से सीखी बातों को अपने अंदाज में ढाला। इसी अनोखे मेल से आगे चलकर इंदौर घराने की पहचान बनी।
उस्ताद अमीर खां का जन्म 15 अगस्त 1912 में एक संगीत परिवार में हुआ था। उनके पिता उस्ताद शाहमीर खां जाने-माने सारंगी वादक थे। बचपन से ही घर में संगीत का माहौल था और कई बड़े कलाकारों का वहां आना-जाना रहता था, जिसके चलते अमीर खां को कम उम्र में ही अलग-अलग तरह की गायकी सुनने का मौका मिला। शुरुआत में उन्होंने पिता से सारंगी सीखना शुरू किया, लेकिन धीरे-धीरे उनका मन गायकी में ज्यादा लगने लगा। पिता ने भी उनके इस रुझान को समझा और उन्हें गायन की तालीम देनी शुरू की। उन्होंने तबले की भी शुरुआती शिक्षा ली थी।
अमीर खां की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने खुद को किसी एक घराने तक सीमित नहीं रखा। उनके पिता के घर कई बड़े संगीतकार आते थे। उन्होंने अलग-अलग उस्तादों की गायकी में से उन बातों को चुना, जो उन्हें अपनी आवाज और संगीत की सोच के हिसाब से सही लगी। इस तरह उनकी अपनी एक नई शैली धीरे-धीरे तैयार हुई।
इस नई शैली को बनाने में तीन उस्तादों का प्रभाव सबसे ज्यादा माना जाता है। उस्ताद अब्दुल वहीद खां से उन्होंने राग को बहुत धीमी गति में खोलने की कला सीखी। उन्होंने इसी अंदाज को अपनी गायकी में खास जगह दी और उनकी प्रस्तुति में बेहद धीमी लय एक बड़ी पहचान बन गई।
दूसरा बड़ा प्रभाव उस्ताद राजब अली खां का था। राजब अली खां अपनी शानदार तान के लिए मशहूर थे। अमीर खां ने उनकी तानों की खासियत को अपने अंदाज में अपनाया। हालांकि उनकी पूरी गायकी तेज नहीं थी, लेकिन जब तानों का दौर आता, तो उसमें तेजी साफ नजर आती थी। इस तरह धीमी शुरुआत के बीच तानों का असर उनकी गायकी को और खूबसूरत बनाता था।
तीसरा बड़ा प्रभाव उस्ताद अमान अली खां का था। उनसे अमीर खां ने मेरुखंड की तकनीक को समझा। इसमें स्वरों को अलग-अलग क्रम में इस्तेमाल किया जाता है। अमीर खां ने इस तकनीक को अपनी गायकी में इस तरह शामिल किया कि उनकी सरगम और तानों में कई तरह के स्वर सुनाई देने लगे। यही वजह थी कि उनकी गायकी बेहद जटिल लगती थी।
अमीर खां ने सभी शैलियों को अपने खास अंदाज में ढाला। अमीर खां ने फिल्मों के लिए भी गाया। 'बैजू बावरा', 'शबाब', 'झनक झनक पायल बाजे' और 'गूंज उठी शहनाई' जैसी फिल्मों से उनका नाम जुड़ा।
संगीत की दुनिया में उन्हें कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और बाद में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 13 फरवरी 1974 को कोलकाता में एक सड़क दुर्घटना में उस्ताद अमीर खां का निधन हो गया।
--आईएएनएस
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