युद्ध का स्वरूप बदल रहा है, हमारी सोच को भी लगातार बदलना होगाः सेना प्रमुख
नई दिल्ली, 27 सितंबर (आईएएनएस)। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल देश में हथियार और सैन्य उपकरण बनाना नहीं है। भारत के पास ऐसी क्षमता होनी चाहिए जिससे वह लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में अपनी सैन्य ताकत को बनाए रख सके। रविवार को यह बात थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ ने कही। उन्होंने कहा कि ऐसी क्षमता होनी चाहिए जिससे बदलती जरूरतों के अनुसार सैन्य ताकत को ढाल सके और लगातार मजबूत कर सके।
उन्होंने आज के युद्धों को ‘रुक-रुक कर होने वाले युद्ध’ बताया है। ‘बदलते युद्ध के दौर में आत्मनिर्भरता’ विषय पर बोलते हुए थल सेनाध्यक्ष ने कहा कि युद्ध का स्वरूप, तकनीक और उसकी अवधि तेजी से बदल रही है। इसलिए सैन्य क्षमता के विकास और आत्मनिर्भरता की हमारी सोच को भी लगातार बदलना होगा।
साल 1971 में ढाका में हुए ऐतिहासिक आत्मसमर्पण का जिक्र करते हुए जनरल सेठ ने कहा, “पिछली सदी के युद्धों की एक स्पष्ट समाप्ति होती थी। 1971 की वह तस्वीर ऐसा ही एक क्षण थी, जब यह साफ था कि युद्ध समाप्त हो गया है। लेकिन आज के युद्धों में ऐसी स्पष्ट समाप्ति दिखाई नहीं देती। संघर्ष लंबे समय तक चलते हैं और बीच-बीच में भीषण लड़ाई होती रहती है। तकनीक लड़ाइयों की अवधि कम कर सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह युद्धों की अवधि भी कम करे। ये ‘रुक-रुक कर होने वाले युद्ध’ हैं।”
उन्होंने कहा कि सैन्य क्षमता को तैयार करने, विकसित करने, परखने और सेना में शामिल करने में कई वर्ष लगते हैं, जबकि तकनीक बहुत कम समय में बदल जाती है। इसलिए चुनौती केवल स्वदेशी हथियार बनाने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि सेना में शामिल होने तक वह तकनीक उपयोगी और आधुनिक बनी रहे।
उन्होंने कहा, “हर परिस्थिति के लिए एक ही समाधान कारगर नहीं हो सकता। भारतीय सेना समुद्र तल से लेकर अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक और अत्यधिक गर्मी से लेकर शून्य से काफी नीचे के तापमान तक काम करती है। इसलिए हमारी सैन्य क्षमताएं भारत की अपनी भौगोलिक परिस्थितियों, अलग-अलग इलाकों और सैन्य जरूरतों के अनुरूप होनी चाहिए। कुछ सौ डॉलर की कीमत वाला ड्रोन लाखों डॉलर की कीमत वाले सैन्य प्लेटफार्म के लिए खतरा बन सकता है। कम कीमत वाली, स्मार्ट और बड़े पैमाने पर उपलब्ध तकनीक अब बेहद महंगे सैन्य हथियारों और उपकरणों के लिए भी खतरा बन सकती है।”
इसके साथ ही सेनाध्यक्ष ने बताया कि तकनीक अब कुछ देशों या संस्थाओं तक सीमित नहीं रही है। जो तकनीक हमारे पास है, वही हमारे विरोधी के पास भी हो सकती है। इसलिए केवल नई तकनीक हासिल करना पर्याप्त नहीं होगा। असली बढ़त इस बात से मिलेगी कि हम विरोधी से कितनी तेजी से नए समाधान खोजते हैं, खुद को बदलते हैं और उसकी तकनीक का जवाब तैयार करते हैं। हालांकि उन्होंने पुरानी सैन्य प्रणालियों को जल्दबाजी में बेकार मान लेने के प्रति भी आगाह किया।
उन्होंने कहा, “आज के युद्ध दिखा रहे हैं कि पुरानी प्रणालियां भी नई तकनीक के साथ बेहद प्रभावी हो सकती हैं। दशकों पहले विकसित की गई एयर डिफेंस तोपें आधुनिक सेंसर और अग्नि नियंत्रण प्रणाली के साथ ड्रोन और ड्रोन समूहों के खिलाफ प्रभावी हो सकती हैं। इसलिए भविष्य की सैन्य क्षमता का अर्थ हमेशा पुराने हथियारों को बदलना नहीं है। कई बार पुरानी और भरोसेमंद प्रणालियों को नई तकनीक से जोड़कर उन्हें और प्रभावी बनाया जा सकता है।”
जनरल सेठ ने कहा कि हमें दूर से मार करने की क्षमता और जमीन पर सीधे युद्ध करने की क्षमता, दोनों की आवश्यकता है। लंबी दूरी के हथियार युद्धक्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन जमीन पर कब्जा करने, उसे अपने नियंत्रण में रखने और उसकी रक्षा करने का काम अंततः सैनिक को ही करना होगा। उन्होंने कहा, “भारतीय सेना को लंबी मारक क्षमता और मजबूत जमीनी क्षमता, दोनों की जरूरत है।”
सूचना, साइबर और अंतरिक्ष सहित युद्ध के नए क्षेत्रों की बढ़ती भूमिका के बावजूद थल सेनाध्यक्ष ने कहा, “जमीन पर नियंत्रण ही सफलता का एकमात्र प्रत्यक्ष संकेतक है। जमीन पर नियंत्रण सैनिक ही स्थापित करता है और वही उसकी रक्षा करता है। इसलिए सैन्य क्षमता से जुड़ा हर निर्णय इस बात को ध्यान में रखकर होना चाहिए कि वह सैनिक को कितना अधिक सक्षम बनाता है। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता के केंद्र में योद्धा होना चाहिए। हर सैन्य क्षमता अंततः योद्धा के लिए बनाई जानी चाहिए।”
इन वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए थल सेनाध्यक्ष ने भविष्य की सैन्य क्षमताओं के विकास के लिए समर्थ की अवधारणा सामने रखी। उन्होंने कहा कि भारतीय रक्षा उत्पाद 80 से अधिक देशों तक पहुंचे हैं। आज 175 में से 159 प्रकार के गोला-बारूद का स्वदेशीकरण हो चुका है। रक्षा उत्पादन में करीब 16,000 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग भाग ले रहे हैं। उन्होंने कहा, “आत्मनिर्भरता हमें लड़ने की स्वतंत्रता देती है। क्षमता हमें लड़ने की सामर्थ्य देती है। योद्धा हमें लड़ने की इच्छाशक्ति देता है। ये सभी मिलकर हमें जीतने की क्षमता देते हैं।”
--आईएएनएस
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