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यादों में अवैद्यनाथ : 23 साल में नया नाम मिला, फिर बने भारतीय राजनीति के सबसे सम्मानित व्यक्ति

नई दिल्ली, 11 सितंबर (आईएएनएस)। किसी संत की पहचान सिर्फ उसके मठ, मंदिर या उसकी आध्यात्मिक साधना से होती है? लेकिन, महंत अवैद्यनाथ की कहानी इस सवाल का जवाब 'नहीं' में देती है। हिमालय की गोद में जन्मा एक बालक, जिसने कम उम्र में माता-पिता को खो दिया। कई तीर्थों की यात्राएं कीं और फिर एक योगी गुरु से उनकी मुलाकात हुई और फिर महज 23 साल की उम्र में उसे एक नया नाम और नई पहचान मिली। समय बीतता गया और आगे चलकर वही व्यक्तित्व गोरक्षपीठ का पीठाधीश्वर बना, विधायक-सांसद बना और राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हुआ।
 

नई दिल्ली, 11 सितंबर (आईएएनएस)। किसी संत की पहचान सिर्फ उसके मठ, मंदिर या उसकी आध्यात्मिक साधना से होती है? लेकिन, महंत अवैद्यनाथ की कहानी इस सवाल का जवाब 'नहीं' में देती है। हिमालय की गोद में जन्मा एक बालक, जिसने कम उम्र में माता-पिता को खो दिया। कई तीर्थों की यात्राएं कीं और फिर एक योगी गुरु से उनकी मुलाकात हुई और फिर महज 23 साल की उम्र में उसे एक नया नाम और नई पहचान मिली। समय बीतता गया और आगे चलकर वही व्यक्तित्व गोरक्षपीठ का पीठाधीश्वर बना, विधायक-सांसद बना और राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हुआ।

12 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि पर उनकी स्मृति केवल एक संत या राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि उस विरासत के संदर्भ में भी की जाती है, जिसका विस्तार उनके बाद योगी आदित्यनाथ तक दिखाई देता है।

महंत अवैद्यनाथ का जन्म 28 मई 1921 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कांड़ी गांव में हुआ था। कम उम्र में ही माता-पिता का निधन हो गया। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा पर गहरा प्रभाव डाला और उनका झुकाव अध्यात्म की ओर बढ़ता गया। युवावस्था में उन्होंने हिमालय से लेकर कैलाश मानसरोवर, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे तीर्थस्थलों की यात्राएं कीं। इन्हीं यात्राओं के दौरान उनके भीतर साधना और वैराग्य की भावना मजबूत होती गई।

साल 1940 में बंगाल यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात गोरखनाथ मठ के तत्कालीन पीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ से हुई। यह मुलाकात उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई। करीब दो साल बाद, 8 फरवरी 1942 को महज 23 साल की उम्र में दिग्विजयनाथ ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और उन्हें 'अवैद्यनाथ' नाम दिया। इसके बाद, 1969 में दिग्विजयनाथ के ब्रह्मलीन होने के बाद अवैद्यनाथ गोरक्षपीठ के पूर्ण पीठाधीश्वर बने।

महंत अवैद्यनाथ जिस परंपरा में आए, उसकी वैचारिक नींव उनके गुरु दिग्विजयनाथ से जुड़ी थी। दिग्विजयनाथ ने साधु-संतों को केवल आध्यात्मिक गतिविधियों तक सीमित न रहकर सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया था। अवैद्यनाथ ने इस विरासत को आगे बढ़ाया। उनके लिए धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित विषय नहीं था। वे इसे सामाजिक संगठन और जागरण का माध्यम मानते थे।

जातिगत भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ भी उन्होंने आवाज उठाई। 1980 के दशक में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में सामूहिक धर्मांतरण की घटना ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने हिंदू समाज की एकता और सामाजिक समरसता पर जोर दिया। उनका तर्क था कि जातिगत विभाजन समाज को कमजोर करता है। गोरक्षपीठ की जिम्मेदारी संभालने से पहले ही अवैद्यनाथ सक्रिय राजनीति में उतर चुके थे। हिंदू महासभा के टिकट पर उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा की मानीराम सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। 1962, 1967, 1974 और 1977 में वो विधायक रहे। इसके बाद उनका राजनीतिक सफर संसद तक पहुंचा। 1970, 1989, 1991 और 1996 में वे गोरखपुर से सांसद चुने गए। बाद में वे भाजपा से जुड़े।

उनकी राजनीति का केंद्र आधार हिंदुत्व, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद रहा। पूर्वांचल में उनका प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भी उनकी मजबूत पकड़ रही। 1990 का दशक भारतीय राजनीति के लिए उथल-पुथल का दौर था। राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर पहुंच रहा था और इसी दौर में महंत अवैद्यनाथ आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में शामिल हुए। साल 1984 में उन्हें श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का अध्यक्ष बनाया गया। उनके सामने बड़ी चुनौती थी, हिंदू समाज के अलग-अलग संप्रदायों, अखाड़ों और धर्माचार्यों को एक मंच पर लाना। उन्होंने इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आंदोलन को व्यापक धार्मिक समर्थन दिलाने का प्रयास किया।

1990 की कारसेवा के दौरान विवादित ढांचे पर पूजा का आयोजन उनके दृढ़ संकल्प से जोड़ा जाता है। उनका रुख स्पष्ट था कि राम मंदिर निर्माण के लक्ष्य से पीछे नहीं हटना है। राम जन्मभूमि आंदोलन ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख धार्मिक-राजनीतिक चेहरा बना दिया। आगे चलकर यही आंदोलन भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाले प्रमुख मुद्दों में शामिल हुआ।

अवैद्यनाथ का योगदान केवल राजनीति और आंदोलन तक सीमित नहीं रहा। गोरखनाथ मठ को उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा से जोड़ने पर भी जोर दिया। वे महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अध्यक्ष रहे। शिक्षा संस्थानों और सामाजिक गतिविधियों के जरिए पूर्वांचल के गरीब और वंचित वर्गों तक सुविधाएं पहुंचाने पर उनका जोर रहा। योगवाणी मासिक पत्रिका के संपादक के रूप में उन्होंने वैचारिक लेखन को भी आगे बढ़ाया। उनकी कार्यशैली में मठ की धार्मिक परंपरा और समाजसेवा का एक साथ विस्तार दिखाई देता है।

महंत अवैद्यनाथ के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शायद उनका उत्तराधिकारी चुनने का फैसला भी है। 1998 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लिया और योगी आदित्यनाथ को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। उसी वर्ष योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से लोकसभा के लिए चुने गए और देश के सबसे कम उम्र के सांसद बने। यह सिर्फ एक उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं थी। इसे गोरक्षपीठ की उस परंपरा की अगली कड़ी के रूप में देखा गया, जिसकी शुरुआत दिग्विजयनाथ से हुई थी और जिसे अवैद्यनाथ ने आगे बढ़ाया था। दिग्विजयनाथ से अवैद्यनाथ और फिर योगी आदित्यनाथ तक पहुंची यह परंपरा आज उत्तर प्रदेश की राजनीति और गोरक्षपीठ की भूमिका को समझने का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

लंबी आध्यात्मिक, सामाजिक और राजनीतिक यात्रा के बाद 12 सितंबर 2014 को गोरखपुर में महंत अवैद्यनाथ का निधन हुआ। नाथ परंपरा के अनुसार उन्हें पद्मासन मुद्रा में समाधि दी गई। उनके निधन के बाद भी उनका नाम गोरक्षपीठ, राम जन्मभूमि आंदोलन और सामाजिक समरसता से जुड़े विमर्श में लगातार लिया जाता रहा।

--आईएएनएस

पीएसके/एबीएम