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काशी का अद्भुत 17वीं शताब्दी का शिवालय, जहां रावण वध के बाद श्रीरामचंद्र ने किए थे महादेव के दर्शन

वाराणसी, 5 अप्रैल (आईएएनएस)। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी के कण-कण में उनका वास माना जाता है। छोटे-बड़े हर एक मंदिर की अपनी एक दिव्यता और अद्भुत भक्ति में लिपटी मान्यता है। महादेव को समर्पित ऐसा ही एक मंदिर है, जो उनके अराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र से भी जुड़ा है।
 
काशी का अद्भुत 17वीं शताब्दी का शिवालय, जहां रावण वध के बाद श्रीरामचंद्र ने किए थे महादेव के दर्शन

वाराणसी, 5 अप्रैल (आईएएनएस)। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी के कण-कण में उनका वास माना जाता है। छोटे-बड़े हर एक मंदिर की अपनी एक दिव्यता और अद्भुत भक्ति में लिपटी मान्यता है। महादेव को समर्पित ऐसा ही एक मंदिर है, जो उनके अराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र से भी जुड़ा है।

काशी के दक्षिणी भाग में स्थित श्री कर्दमेश्वर महादेव मंदिर एक अद्भुत और प्राचीन शिवालय है। यह मंदिर मुगलों के 17वीं सदी के विनाशकारी हमलों में भी बच गया और आज भी अपनी मूल गरिमा को बनाए हुए है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने लंका विजय के बाद रावण वध से लगे ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति पाने के लिए यहां महादेव के दर्शन किए थे।

कर्दमेश्वर महादेव मंदिर काशी का सबसे प्राचीन बचा हुआ शिव मंदिर माना जाता है। कर्दम ऋषि ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी, इसलिए इसका नाम कर्दमेश्वर पड़ा। काशी पंचकोशी परिक्रमा (25 किलोमीटर लंबी पवित्र यात्रा) का यह पहला प्रमुख पड़ाव माना जाता है। तीर्थयात्री यहीं से अपनी यात्रा शुरू करते हैं। मान्यता है कि मंदिर शिखर के दर्शन मात्र से व्यक्ति देव ऋण से मुक्त हो जाता है।

किंवदंतियों के अनुसार, रावण वध के बाद भगवान राम को ब्रह्महत्या का दोष लगा। गुरु वशिष्ठ की सलाह पर राम-सीता यहां आए और महादेव के दर्शन व परिक्रमा करने के बाद उन्हें पाप से मुक्ति मिली।

यह मंदिर नागर शैली में बना है और पंचरथ डिजाइन का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें एक चबूतरा है, जिस पर गर्भगृह, प्रदक्षिणा पथ, अंतराल, महामंडप और अर्द्धमंडप स्थित हैं। मंदिर पूर्व मुखी है। दीवारों पर दिव्य नर्तकियों, संगीतकारों, सांपों और पौराणिक जानवरों की सुंदर नक्काशी है, जो 6वीं-7वीं शताब्दी की बताई जाती है। मंदिर के पास कर्दम कुंड है। मान्यता है कि यह कुंड कर्दम ऋषि के आंसुओं से बना है, बाद में 18वीं शताब्दी में बंगाल की रानी भवानी ने इसे ठीक कराया।

मंदिर का ऐतिहासिक महत्व भी है। 11वीं शताब्दी में गहड़वाला वंश के चंद्रदेव ने आक्रमण के बाद काशी को फिर से स्थापित किया। यह मंदिर 12वीं शताब्दी का बताया जाता है और मुगलों के विनाश से बचकर 17वीं सदी तक अपनी मूल संरचना बनाए रखने वाला काशी का एकमात्र मंदिर है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे प्राचीन व ऐतिहासिक स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1956 के तहत संरक्षित किया हुआ है।

मंदिर प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है। सुबह-शाम और रात में आरती होती है। प्रवेश निःशुल्क है। दर्शन के लिए सुबह या शाम का समय सबसे अच्छा माना जाता है।

मंदिर वैष्णो नगर कॉलोनी, कंचनपुर, कंदवा क्षेत्र में स्थित है। वाराणसी शहर से ऑटो, टैक्सी या प्राइवेट वाहन से आसानी से पहुंचा जा सकता है। वहीं, वाराणसी जंक्शन या लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट से टैक्सी लेकर लगभग 30-45 मिनट में मंदिर तक पहुंच सकते हैं।

--आईएएनएस

एमटी/एबीएम