वैश्विक तापमान में 1 डिग्री का बदलाव भी महत्वपूर्ण, समझें 'ग्लोबल वार्मिंग'-'जलवायु परिवर्तन' और 'मौसम' में अंतर
नई दिल्ली, 17 मई (आईएएनएस)। दुनिया भर का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। पृथ्वी की सतह की हवा का तापमान तेजी से ऊपर जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक तापमान में सिर्फ एक डिग्री का बदलाव भी बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके लिए भारी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। इस छोटे से बदलाव का असर पूरी पृथ्वी की जलवायु, मौसम, समुद्रों और जंगलों पर पड़ता है।
सबसे पहले समझें कि ग्लोबल वार्मिंग क्या है? अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के माई नासा अर्थ डाटा पोर्टल पर इस विषय में विस्तार से जानकारी मिलती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, दुनिया के औसत तापमान में हो रही लगातार बढ़ोतरी को ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं। इसका मुख्य कारण जीवाश्म ईंधन यानी कोयला, पेट्रोल, डीजल जलाने से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें हैं।
नासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट के अनुसार, 1880 के बाद से पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 0.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। इसमें से दो-तिहाई बढ़ोतरी 1975 के बाद हुई है।
जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग इन दोनों में अक्सर अंतर नहीं कर पाते और दोनों को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन दोनों में अंतर है। ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ तापमान बढ़ने की बात करता है। वहीं, जलवायु परिवर्तन एक व्यापक शब्द है। इसमें तापमान के अलावा बारिश के पैटर्न, सूखा, बाढ़, समुद्र के स्तर में वृद्धि, हिमनदों का पिघलना और समुद्री जीवों पर पड़ने वाले प्रभाव भी शामिल हैं।
इसी तरह मौसम और जलवायु में भी अंतर है। ये दो शब्द सबसे ज्यादा भ्रम पैदा करते हैं। मौसम किसी खास जगह पर छोटे समय यानी कुछ घंटे या दिन का हाल है। जैसे आज बारिश हो रही है या कल तेज हवा चलेगी। वहीं, जलवायु किसी इलाके या पूरी दुनिया का लंबे समय यानी कई सालों या दशकों का औसत पैटर्न है।
उदाहरण के तौर पर, आपके शहर में एक साल अचानक ज्यादा बारिश होना मौसम है, लेकिन कई सालों से बारिश का पैटर्न बदलना जलवायु परिवर्तन का संकेत हो सकता है।
वैज्ञानिक बताते हैं कि वैश्विक तापमान में एक डिग्री बदलाव भी मायने रखता है। स्थानीय स्तर पर रोजाना तापमान 10-15 डिग्री तक बदल सकता है, लेकिन वैश्विक औसत में 1 डिग्री बढ़ना बहुत बड़ी घटना है। इससे समुद्र का पानी फैलता है, हिमनद पिघलते हैं, मौसम के चरम रूप जैसे भीषण गर्मी, भारी बारिश, सूखा बढ़ते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, 1951-1980 को आधार अवधि माना जाता है, जब दुनिया का औसत तापमान करीब 14 डिग्री सेल्सियस था।वैश्विक तापमान मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि पृथ्वी सूर्य से कितनी ऊर्जा लेती है और कितनी वापस अंतरिक्ष में छोड़ती है। ग्रीनहाउस गैसें इस ऊर्जा को रोक लेती हैं, जिससे पृथ्वी गर्म होती जाती है।
--आईएएनएस
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