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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उत्तराखंड सरकार के 'अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक 2025' का किया विरोध

नई दिल्ली, 27 अप्रैल (आईएएनएस)। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उत्तराखंड सरकार द्वारा हाल ही में पेश किए गए अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक 2025 का विरोध किया। इसके साथ ही बोर्ड ने इस विधेयक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही।
 
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उत्तराखंड सरकार के 'अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक 2025' का किया विरोध

नई दिल्ली, 27 अप्रैल (आईएएनएस)। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उत्तराखंड सरकार द्वारा हाल ही में पेश किए गए अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक 2025 का विरोध किया। इसके साथ ही बोर्ड ने इस विधेयक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सोमवार को बयान जारी कर कहा कि भारत का संविधान अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 30 धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने स्वयं के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका संचालन करने का पूर्ण अधिकार प्रदान करता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे देश में धार्मिक मूल्यों के संरक्षण के लिए मदरसे अत्यंत महत्वपूर्ण संस्थानों में से हैं। भारत के संविधान ने इन अधिकारों को मौलिक अधिकारों के रूप में मान्यता दी है, इसलिए इनकी सुरक्षा मुस्लिम समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी है।

बोर्ड ने कहा कि मदरसों ने देश की स्वतंत्रता और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और आज भी निभा रहे हैं। हालांकि, यह अत्यंत खेदजनक है कि विभाजनकारी और घृणा से प्रेरित राजनीति के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने वाले कुछ तत्व मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक पहचान से वंचित करने का प्रयास कर रहे हैं। इस निरंतर प्रवृत्ति के अंतर्गत इस्लामी मदरसों को कमजोर करने का एक सुनियोजित प्रयास प्रतीत होता है।

बोर्ड ने आगे कहा कि हाल ही में उत्तराखंड सरकार ने एक विधेयक पेश किया, जिसके तहत सभी मदरसों के लिए सरकारी शिक्षा बोर्ड में पंजीकरण कराना अनिवार्य किया जा रहा है। इसके अलावा, शिक्षा बोर्ड यह निर्धारित करेगा कि कौन सी धार्मिक सामग्री पढ़ाई जा सकती है और कौन सी नहीं, और पाठ्यक्रम भी वही होगा जो सरकार द्वारा निर्धारित किया गया है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा, "हमारा मानना ​​है कि यह कानून संविधान में निहित गारंटी और मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है। यह एक धर्मनिरपेक्ष राज्य से अपेक्षाओं के भी विपरीत है, इसलिए इसका विरोध करना और मदरसों की संवैधानिक रूप से प्रदत्त स्वायत्तता को संरक्षित करना पूरे मुस्लिम समुदाय का दायित्व है। इस मामले से संबंधित कुछ मामले वर्तमान में उत्तराखंड उच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं। आवश्यकता पड़ने पर इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में भी ले जाया जाएगा।

बता दें कि उत्तराखंड सरकार ने अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक 2025 के तहत राज्य मदरसा बोर्ड को समाप्त कर दिया है, और सभी मदरसों को अब उत्तराखंड बोर्ड या सीबीएसई से मान्यता लेना अनिवार्य कर दिया है।

--आईएएनएस

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