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उत्तराखंड की लोक आस्था के रक्षक हैं हरू-सैम देवता, न्याय और समृद्धि के हैं प्रतीक

देहरादून, 29 अक्टूबर (आईएएनएस)। देवभूमि उत्तराखंड की धरा पर लोक-संस्कृति में देवी-देवताओं का वास है। कुमाऊं मंडल की इसी लोक-आस्था के सबसे बड़े आधार हैं, न्याय और समृद्धि के प्रतीक 'श्री हरू-सैम देवता'। लोक कथाओं के अनुसार, हरू देवता और सैम देवता को न्याय, सत्य और लोक कल्याण का प्रतीक माना जाता है।
 

देहरादून, 29 अक्टूबर (आईएएनएस)। देवभूमि उत्तराखंड की धरा पर लोक-संस्कृति में देवी-देवताओं का वास है। कुमाऊं मंडल की इसी लोक-आस्था के सबसे बड़े आधार हैं, न्याय और समृद्धि के प्रतीक 'श्री हरू-सैम देवता'। लोक कथाओं के अनुसार, हरू देवता और सैम देवता को न्याय, सत्य और लोक कल्याण का प्रतीक माना जाता है।

अल्मोड़ा के जागेश्वर के पास स्थित झंकार सैम मंदिर में सैम देवता की पूजा स्वयंभू शिवलिंग के रूप में की जाती है। कुमाऊं की लोक परंपरा में हरू और सैम दोनों भाई हैं और इनके मंदिर हमेशा एक-साथ स्थापित होते हैं। इनके बारे में यह लोकोक्ति बहुत प्रसिद्ध है, "हरू आये हरियाली लाये, हरू जाये सब कुछ नष्ट हो जाये।"

लोक गाथाओं और 'जागरों' (उत्तराखंड के पारंपरिक धार्मिक गीत) के अनुसार, इन्हें चम्पावत का राजा या राजकुमार (राजा हरिश्चंद्र का रूप) माना जाता है। वे एक अत्यंत सात्विक, न्यायप्रिय और सिद्ध पुरुष थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन दीन-दुखियों की सेवा में समर्पित कर दिया था। इन्हें भगवान शिव का अंशावतार या स्वयंभू रूप माना जाता है। लोक मान्यताओं में इन्हें "देवताओं का गुरु" और कुछ परंपराओं में देवताओं का 'मामा' (मामू) भी कहा जाता है। इन दोनों को समृद्धि, सुख-शांति और गांवों की सीमाओं का रक्षक देवता माना जाता है।

हरू देवता को पूरी तरह सात्विक माना जाता है, इसलिए यहां मुख्य रूप से फल-फूल, मेवा, मिष्ठान्न और पारंपरिक कुमाऊंनी 'रोट' (मीठी पूड़ी) का भोग लगाया जाता है। नवरात्रि, पौष महीने की वैसी (धुनी जागृत करना), डंगरिया परंपरा (देव डांगुर) समेत कई त्योहार पर इस मंदिर में विशेष अनुष्ठान देखने को मिलता है।

नवरात्रि के पर्व पर यहां बेहद भव्य पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री समेत कई बड़ी हस्तियां और दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु यहां शीश नवाने आते हैं जबकि पौष (पूस) के महीने में यहां विशेष 'बैसी' (धार्मिक व्रत और अनुष्ठान) का आयोजन होता है। इस दौरान गुरु गोरखनाथ और हरू-सैमज्यू के दरबार में पवित्र धुनी जागृत की जाती है।

कुमाऊं संस्कृति के अनुसार, विशेष अवसरों पर देवताओं के 'डंगरिया' (वे व्यक्ति जिनके शरीर में देवता अवतरित होते हैं) पारंपरिक वाद्य यंत्रों (ढोल-दमोह) की थाप पर नृत्य करते हैं और भक्तों के कष्टों को दूर करने का आशीर्वाद देते हैं।

--आईएएनएस

एनएस/पीएम