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तमिलनाडु: तिरुचेंदूर सुब्रमण्य स्वामी मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, समुद्र तट पर जलाए दीपक

तिरुचेंदूर, 27 सितंबर (आईएएनएस)। तमिलनाडु के तिरुचेंदूर में स्थित तिरुचेंदूर अरुलमिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर में श्रद्धालुओं की जबरदस्त भीड़ उमड़ी है। रविवार होने और स्कूलों में छुट्टी होने के कारण हजारों भक्तों ने मंदिर में दर्शन पूजन किए हैं।
 

तिरुचेंदूर, 27 सितंबर (आईएएनएस)। तमिलनाडु के तिरुचेंदूर में स्थित तिरुचेंदूर अरुलमिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर में श्रद्धालुओं की जबरदस्त भीड़ उमड़ी है। रविवार होने और स्कूलों में छुट्टी होने के कारण हजारों भक्तों ने मंदिर में दर्शन पूजन किए हैं।

तिरुचेंदूर अरुलमिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर में शनिवार को पूर्णिमा के अवसर पर भी लोगों की भीड़ पहुंची। हजारों भक्त तिरुचेंदूर सुब्रमण्य स्वामी मंदिर के समुद्र तट पर जमा हुए। उन्होंने मंदिर के पास समुद्र तट पर जमा हुए भक्तों ने रेत पर बैठकर दीपक जलाए और चंद्रमा की पूजा की। कई भक्तों ने स्वामी के दर्शन के लिए लंबी कतार में इंतजार भी किया।

कई लोग पूर्णिमा की रस्म के तहत रात भर मंदिर के पास समुद्र तट पर ही रुके रहे। अगले दिन रविवार को छुट्टी होने के कारण भी मंदिर में भक्तों की भीड़ रही है।

तिरुचेंदुर मंदिर, भगवान मुरुगन के छह पवित्र स्थानों में से एक है। इस मंदिर की एक खास बात यह है कि यह भारतीय प्रायद्वीप के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित है। यह वही पवित्र स्थान है जहां भगवान मुरुगन ने देवताओं के देवसेनापति का रूप धारण किया और नाम के असुर का वध करके बुराई पर विजय प्राप्त की थी।

तब से तमिल लोग 'स्कंद षष्ठी' के दौरान इसे एक वार्षिक उत्सव के रूप में मनाते आ रहे हैं। संगम साहित्य और 'शिलप्पदिकारम' में उल्लिखित यह मंदिर लगभग 2000-3000 साल पुराना माना जाता है।

यह समुद्र तट पर स्थित मंदिर भगवान मुरुगन को समर्पित है। जिस स्थान पर यह मंदिर स्थित है, उसे पहले 'तिरुचिरलाईवाई' के नाम से जाना जाता था। मंदिर का गोपुरम (शिखर) 157 फीट ऊंचा है और इसमें नौ मंजिलें हैं। सुरपद्मन पर विजय प्राप्त करने के बाद, भगवान मुरुगन ने अपनी जीत के लिए आभार व्यक्त करने के लिए भगवान शिव की पूजा की थी। यहां मुरुगन की प्रतिमा के दाहिने हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। वे शिव योगी की तरह अपने सिर पर 'जटा-मुकुट' भी धारण किए हुए हैं

पिछले कुछ सालों से श्रद्धालु पूर्णिमा के दिनों में यहां बड़ी संख्या में आ आते हैं। वे पूरी रात मंदिर के समुद्र तट पर रुकते हैं, दीपक जलाते हैं और चंद्रमा की पूजा करते हैं।

--आईएएनएस

डीसीएच/