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स्वतंत्र भारत की मजबूत औद्योगिक और तकनीकी प्रगति के वास्तविक शिल्पकार थे डॉ. मुखर्जी: डॉ. सुधांशु त्रिवेदी

नई दिल्ली, 5 जुलाई (आईएएनएस)। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सदस्य डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के ऐतिहासिक योगदान और बलिदान को नमन किया। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी न केवल एक महान राष्ट्रवादी नेता थे, बल्कि स्वतंत्र भारत की मजबूत औद्योगिक और तकनीकी प्रगति के वास्तविक शिल्पकार भी थे।
 

नई दिल्ली, 5 जुलाई (आईएएनएस)। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सदस्य डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के ऐतिहासिक योगदान और बलिदान को नमन किया। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी न केवल एक महान राष्ट्रवादी नेता थे, बल्कि स्वतंत्र भारत की मजबूत औद्योगिक और तकनीकी प्रगति के वास्तविक शिल्पकार भी थे।

भाजपा सांसद ने कहा कि स्वतंत्रता के तुरंत बाद कांग्रेस का सदस्य न होने के बावजूद डॉ. मुखर्जी के अद्वितीय कौशल और राष्ट्र-प्रथम की सोच को देखते हुए उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था। उनके कार्यकाल के दौरान ही देश को 'चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स, 'दामोदर घाटी नदी परियोजना' (भारत की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में से एक) और 'हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड' का वर्तमान स्वरूप मिला। डॉ. मुखर्जी का स्पष्ट मानना था कि जब तक भारत प्रौद्योगिकी और स्वदेशी उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं होगा, तब तक हमारी स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार डॉ. मुखर्जी के इन्हीं विचारों और पदचिन्हों पर चलते हुए देश को 'आत्मनिर्भर भारत' बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। हमारी 'प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव' योजना इसी सोच का परिणाम है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर है। साल 2014 से पहले भारत दुनिया में मोबाइल का केवल एक बड़ा उपभोक्ता (कंज्यूमर) था, लेकिन आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल उत्पादक देश बन चुका है। सैमसंग की दुनिया की सबसे बड़ी फैक्ट्री नोएडा में है और एप्पल के आईफोन का निर्माण भी अब चीन के बाहर सबसे बड़े स्तर पर भारत में ही हो रहा है।

डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने वर्ष 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना के साथ देश को 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की विचारधारा दी। उन्होंने हमेशा भारत की सांस्कृतिक अखंडता को सर्वोपरि रखा। वंदे मातरम गीत के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा और देश की अखंड चेतना को जगाने का उनका प्रयास आज भी राष्ट्र को प्रेरित करता है। भाजपा इतिहास का वह एकमात्र दल है जिसने 1950 के दशक से लेकर आज तक अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को कभी नहीं बदला।

लियाकत-नेहरू समझौते के विरोध का जिक्र करते हुए डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि जब डॉ. मुखर्जी ने 6 जुलाई 1950 को मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया, तो उनका मुख्य उद्देश्य पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा करना था। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाया गया नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) उसी ऐतिहासिक भूल को सुधारने और प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को न्याय देने का एक प्रामाणिक प्रयास है।

इसी तरह, जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए डॉ. मुखर्जी ने 'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे' का ऐतिहासिक नारा दिया। वर्ष 1953 में कश्मीर की सीमा पर उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में हुई गिरफ्तारी और रहस्यमयी मृत्यु आज भी एक बड़ा सवाल है, जहां उन्हें जानबूझकर दिल्ली की अदालत और भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से दूर रखने की राजनीतिक साजिश रची गई।

डॉ. त्रिवेदी ने गर्व व्यक्त करते हुए कहा कि उनके इसी सर्वोच्च बलिदान का सम्मान करते हुए 5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 को समाप्त कर कश्मीर को हमेशा के लिए भारत का अभिन्न अंग बनाया।

उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 1966 में जनसंघ ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के समय यह संकल्प पारित किया था कि भारत को एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनना चाहिए। सत्ता में आने के बाद वर्ष 1998 में श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पोखरण परमाणु परीक्षण कर इस सपने को पूरा किया और आज मोदी सरकार ने भारतीय सेना को जल, थल और नभ तीनों मोर्चों पर अत्याधुनिक न्यूक्लियर मिसाइलों और सबमरीन से सुसज्जित कर भारत को वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर दिया है।

--आईएएनएस

डीकेएम/वीसी