सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार को सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं : सुरेश भारद्वाज
शिमला, 6 जून (आईएएनएस)। हिमाचल प्रदेश के शिमला में भाजपा नेता और पूर्व मंत्री सुरेश भारद्वाज ने राज्य सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। जिला परिषद सदस्यों के शपथ ग्रहण समारोह में हुए हंगामे को लेकर उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार पूरी तरह से विफल साबित हो रही है और जनता में इसके खिलाफ गहरा रोष है। सरकार को सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है।
उन्होंने दावा किया कि इस बार जिला परिषद चुनावों में जनता का रुझान असाधारण रहा है और कई क्षेत्रों में मतदाताओं ने एकतरफा तरीके से सरकार के खिलाफ वोट किया है। उनके अनुसार, यह स्थिति पहले कभी नहीं देखी गई थी, जहां इतनी बड़ी संख्या में लोग किसी सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ स्पष्ट रूप से मतदान करें। यह जनता का आक्रोश है, जिसे सरकार और प्रशासन अब तक समझ नहीं पाए हैं।
सुरेश भारद्वाज ने यह भी कहा कि अधिकारियों और सरकार को इस संदेश को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार को सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने दावा किया कि जिला परिषद चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया है और 10 में से 9 सीटों पर भाजपा समर्थित उम्मीदवारों की जीत हुई है, जबकि केवल एक सीट कांग्रेस के खाते में गई है। उन्होंने इसे जनता के समर्थन का प्रमाण बताया।
पूर्व मंत्री ने कहा कि भाजपा ने अपने उम्मीदवारों की सूची विधिवत रूप से जारी की थी और सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के कुछ मंत्री स्थिति को लेकर गलत बयानबाजी कर रहे हैं और विधानसभा में भी भ्रामक बातें रखी जा रही हैं। उन्होंने कहा कि कुछ मंत्री लगातार असंगत और अनावश्यक भाषण दे रहे हैं, जिससे राजनीतिक वातावरण और अधिक तनावपूर्ण हो रहा है।
उन्होंने मुख्यमंत्री पर भी तंज कसते हुए कहा कि सरकार में अस्थिरता और घबराहट का माहौल है। उनके अनुसार, मुख्यमंत्री और उनकी टीम की कार्यशैली से यह स्पष्ट हो गया है कि प्रशासनिक संतुलन बिगड़ चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हालात इसी तरह बने रहे तो आने वाले समय में सरकार के लिए स्थिति और अधिक कठिन हो सकती है।
सुरेश भारद्वाज ने आगे कहा कि देश में 1952 से लगातार चुनाव हो रहे हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया समय-समय पर विभिन्न स्तरों पर चलती रहती है, चाहे वह लोकसभा हो, विधानसभा हो, नगर निकाय हों या पंचायती राज संस्थाएं। उन्होंने कहा कि चुनाव और शपथ ग्रहण जैसी प्रक्रियाएं लोकतंत्र का हिस्सा हैं और इनमें पारदर्शिता और परंपराओं का पालन बेहद जरूरी होता है।
उन्होंने शपथ ग्रहण समारोह से जुड़े हालिया घटनाक्रम पर भी आपत्ति जताई और कहा कि इस तरह की परिस्थितियां पहले कभी नहीं देखी गईं। शपथ ग्रहण एक औपचारिक और सार्वजनिक कार्यक्रम होता है, जिसमें नवनिर्वाचित सदस्य अपने परिजनों के साथ शामिल होते हैं। ऐसे आयोजनों में मीडिया की उपस्थिति लोकतंत्र के लिए आवश्यक है क्योंकि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि इस बार शपथ ग्रहण समारोह में परिजनों और मीडिया को रोका गया, जो कि लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है। यदि कोई बैठक गोपनीय होती तो उसमें रोक लगाना समझ में आता है, लेकिन सार्वजनिक शपथ ग्रहण में इस तरह की पाबंदी उचित नहीं है। यह पहली बार हुआ है जब इस तरह की रोक देखी गई है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे पहले नगर निगम, नगर निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के शपथ ग्रहण समारोह में कभी ऐसी स्थिति नहीं बनी। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब प्रशासनिक स्तर पर गलत निर्णयों का परिणाम है और अधिकारियों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। प्रशासन को नियमों और परंपराओं के अनुसार कार्य करना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक दबाव में।
--आईएएनएस
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