स्नान के बाद गजानन बेशा में सजेंगे महाप्रभु जगन्नाथ, पहनेंगे हाथी के मुखौटे और पोशाक
पुरी, 29 जून (आईएएनएस)। महाप्रभु जगन्नाथ का गजानन बेशा देवस्नान पूर्णिमा पर सोमवार को है। स्नान मंडप में 108 कलशों के जल से स्नान करने के बाद, भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहनों को भगवान गणेश के समान हाथी के मुखौटे और पोशाक से सजाया जाएगा। गजानन बेशा के लिए जोरदार तैयारियां की गई हैं।
परंपरा के अनुसार, इस खास पोशाक की सभी चीजें (भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र के लिए शोला सजावट, कान के गहने, हाथी की सूंड, मुकुट) और दूसरी चीजें लगभग पूरी हो चुकी हैं। पिछले कई दिनों से, मठ के कारीगर और शिल्पकार देवताओं के लिए इन खास औपचारिक सजावटों को तैयार करने के लिए पूरी लगन और समर्पण के साथ काम कर रहे हैं।
कारीगर सत्यनारायण बेहरा गजानन बेश (सजावट) तैयार करने वाले कारीगरों में से एक हैं। आईएएनएस से बातचीत करते हुए उन्होंने बताया कि यह काम अक्षय तृतीया से शुरू होता है और स्नान पूर्णिमा तक चलता है, जो लगभग डेढ़ महीने तक चलता है। काम शुरू होने के बाद से लगातार आगे बढ़ रहा है, और जैसा कि आप मेरे पीछे देख सकते हैं, सजावट का ज्यादातर काम पहले ही पूरा हो चुका है।
उन्होंने बताया कि इस पवित्र सेवा में लगे सभी लोग पहले दिन से ही भगवान जगन्नाथ को समर्पित हो जाते हैं। वे सख्त अनुशासन का पालन करते हैं और काम करते समय पूरी पवित्रता बनाए रखते हैं। उन्होंने कहा कि हमें अपने बड़ों से एक जरूरी सीख मिली है कि पहले खुद को पवित्र करो, और उसके बाद ही भगवान की सेवा करो। क्योंकि ये सजावट खुद देवता पहनेंगे, अंदर की पवित्रता जरूरी मानी जाती है। बिना अपनी पवित्रता के, सच्ची पवित्रता नहीं मिल सकती। इसी विश्वास के साथ, हर कारीगर (चाहे छोटा हो या बड़ा) भगवान की मौजूदगी में पूरी लगन से काम करता है।
एक और जरूरी बात यह है कि हम कभी नहीं सोचते कि हम यह काम अपनी काबिलियत से कर रहे हैं। हम काम का हर कदम भगवान को सौंप देते हैं। उनके मार्गदर्शन के बिना कुछ भी मुमकिन नहीं है। हम बस उनकी मर्ज़ी के हिसाब से उनकी सेवा करते हैं।
सत्यनारायण बेहरा ने आईएएनएस से कहा कि इन गहनों को बनाने में इस्तेमाल होने वाली हर चीज पूरी तरह से नेचुरल है। चिपकाने वाला पदार्थ नेचुरल पेड़ के गोंद से तैयार किया जाता है। बेंत, सोना, धागा और हर दूसरी चीज नेचुरल तरीके से मिलती है। इस प्रोसेस में किसी भी केमिकल चीज का इस्तेमाल नहीं होता। यह काम दो मास्टर कारीगर (करात सेवायत), दो कारीगर और एक चित्रकार सेवायत (पारंपरिक पेंटर) करते हैं। कुल मिलाकर, डेढ़ महीने के समय में पांच कारीगर इस सेवा में लगे रहते हैं।
उन्होंने बताया कि रथ अनुकूल (रथ बनाने की रस्म) के दिन से, जैसे रथों के लिए एक खास रस्म की जाती है, वैसे ही इन पवित्र गहनों को बनाने के लिए भी ऐसा ही रिवाज किया जाता है। उस दिन से, इस सेवा के लिए समर्पित सभी कारीगर पूरे डेढ़ महीने तक अपने घरों से दूर रहते हैं। वे मठ या तय जगह पर रहते हैं और दिन में एक बार शाम से पहले मंदिर से भेजा गया महाप्रसाद ही खाते हैं। वे पूरे समय इसी अनुशासित जीवनशैली को जारी रखते हैं।
उन्होंने बताया कि सुबह से रात तक, कोई भी काम शुरू करने से पहले, सबसे पहले हम अपनी अंदर की पवित्रता को देखते हैं। अगर कोई व्यक्ति आध्यात्मिक और धार्मिक रूप से पवित्र नहीं है, तो वह यह पवित्र संस्कार नहीं कर सकता।
--आईएएनएस
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