मेटा विवाद पर साइबर एक्सपर्ट रितेश भाटिया बोले- 'सिर्फ माफी नहीं, जवाबदेही भी जरूरी'
मुंबई, 6 अगस्त (आईएएनएस)। सोशल मीडिया कंपनी मेटा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फेसबुक पोस्ट पर अस्थायी रूप से लगी रोक के लिए माफी मांगी। कंपनी के मुख्य वैश्विक मामलों के अधिकारी जोएल कैपलन ने कहा कि इस गलती के लिए केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव से सीधे माफी मांगी गई है।
इस मामले को लेकर साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट रितेश भाटिया ने ऑनलाइन सुरक्षा, आईटी कानून और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सिर्फ माफी नहीं बल्कि जवाबदेही की जरूरत है।
आईएएनएस से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े डिजिटल विवाद के बाद मेटा को सफाई देनी पड़ी हो। इससे पहले भी चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (सीएसएएम) और डीपफेक जैसे गंभीर मामलों में बड़े पैमाने पर आपत्तिजनक डिजिटल और भौतिक कंटेंट का प्रसार हुआ था, जिस पर व्यापक हंगामा मचा था।
रितेश भाटिया ने बताया कि उसके बाद इस दिशा में क्या ठोस कार्रवाई हुई, इसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई। उनका कहना है कि इतने गंभीर मामलों में भी अपेक्षित स्तर पर सख्त कदम नजर नहीं आए, जबकि बच्चों से जुड़े यौन शोषण संबंधी सामग्री का प्रसार एक बेहद गंभीर कानूनी अपराध है।
उन्होंने कहा कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े मामले में घटनाक्रम तेजी से बदला और लगातार दबाव व कड़ी प्रतिक्रिया के बाद मेटा ने तीन दिनों के भीतर माफी मांग ली। भाटिया ने कहा, यह स्थिति इस बात को दर्शाती है कि अलग-अलग मामलों में कार्रवाई की गति और प्राथमिकताओं में अंतर दिखाई देता है। उनका मानना है कि चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल जैसे संवेदनशील मामलों में जिस स्तर की तत्परता अपेक्षित थी, वैसी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली, जबकि प्रधानमंत्री से जुड़े मामले में अपेक्षाकृत तेजी से कदम उठाए गए।
साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट ने कहा कि मेटा का रिकॉर्ड पहले भी विवादों से जुड़ा रहा है। कई देशों में कंपनी की ओर से विभिन्न प्रकार की गलतियां सामने आई हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में मेटा माफी मांगकर आगे बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि केवल माफी मांग लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करने और भविष्य में पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था भी आवश्यक है।
रितेश भाटिया ने सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि मेटा का अक्सर यह तर्क रहता है कि वह केवल एक प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराता है और यदि कोई यूजर गलत गतिविधि करता है तो उसकी जिम्मेदारी कंपनी की नहीं है।
उन्होंने कहा कि मौजूदा डिजिटल दौर में इस दृष्टिकोण पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। भारत का सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम वर्ष 2000 में बनाया गया था और वर्ष 2008 में इसमें संशोधन किया गया था। अब वर्ष 2026 में डिजिटल तकनीक, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के तेजी से बदलते स्वरूप को देखते हुए नए आईटी कानून की जरूरत पहले से कहीं अधिक महसूस हो रही है। उन्होंने सरकार से जल्द से जल्द नया और आधुनिक आईटी एक्ट लागू करने की मांग की।
भाटिया ने कहा कि इस पूरे मुद्दे पर भारत को अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर चर्चा करनी चाहिए, न कि केवल मेटा के दृष्टिकोण से। उनके अनुसार, सरकार और संबंधित एजेंसियों को स्पष्ट शर्तें तय करनी चाहिए कि चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल जैसे कंटेंट के लिए किसी भी प्रकार की सहनशीलता नहीं होनी चाहिए। साथ ही, एआई से तैयार किए जा रहे कंटेंट और डीपफेक पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में एआई के कारण बड़े बदलाव और चुनौतियां सामने आई हैं। ऐसे में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सोशल मीडिया कंपनियों की एआई से तैयार किए गए कंटेंट की पहचान करने और उसे रोकने की क्या रणनीति है।
--आईएएनएस
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