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सिद्धबली बाबा का पावन धाम, शांत वादियों में विराजते हैं संकटमोचक हनुमान

उत्तराखंड, 3 मार्च (आईएएनएस)। उत्तराखंड के कोटद्वार में स्थित श्री सिद्धबली मंदिर रामभक्त हनुमान के लिए प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है। शांत पहाड़ों के बीच बसा यह मंदिर अपनी पौराणिक पहचान और धार्मिक मान्यताओं के लिए काफी प्रसिद्ध है।
 
सिद्धबली बाबा का पावन धाम, शांत वादियों में विराजते हैं संकटमोचक हनुमान

उत्तराखंड, 3 मार्च (आईएएनएस)। उत्तराखंड के कोटद्वार में स्थित श्री सिद्धबली मंदिर रामभक्त हनुमान के लिए प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है। शांत पहाड़ों के बीच बसा यह मंदिर अपनी पौराणिक पहचान और धार्मिक मान्यताओं के लिए काफी प्रसिद्ध है।

त्तराखंड के कोटद्वार में स्थित श्री सिद्धबली मंदिर शांति और भक्ति की खास ऊर्जा से भरा रहता है। यहां रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर में हनुमान जी के साथ-साथ अन्य देवताओं की भी पूजा होती है और ऐसी मान्यता है कि भक्त यहां से कभी खाली हाथ नहीं लौटते हैं।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मंदिर की विशेष वीडियो अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शेयर की। उन्होंने लिखा, पौड़ी गढ़वाल के कोटद्वार में स्थित सिद्धबली मंदिर प्रभु हनुमान की असीम कृपा और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। शांत वातावरण और भक्तिमय ऊर्जा से ओतप्रोत इस पावन धाम में प्रतिदिन अनेकों भक्त दर्शन करते हैं। आप भी पौड़ी गढ़वाल के आगमन पर इस पावन धाम के दर्शन अवश्य करें।

श्री सिद्धबली मंदिर उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंदिर में दर्शन करने से हनुमान अपने भक्तों की मुराद पूरी करते हैं और मन्नत पूरी होने के बाद लोग यहां भंडारा करवाते हैं।

मंदिर को लेकर एक पौराणिक कथा काफी प्रचलित है। कथा के अनुसार, गोरखनाथ को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। उन्हें भक्ति आंदोलन का जनक माना जाता है। गोरखनाथ को उत्तराखंड के कोटद्वार में सिद्धि प्राप्त हुई थी, जिसकी वजह से उन्हें सिद्धबाबा कहा जाता है।

गोरखनाथ के गुरु मछेंद्र थे और वे बजरंगबली की आज्ञा से त्रिया राज्य की रानी मैनाकनी के साथ रह रहे थे। इस बात की जानकारी गोरखनाथ को मिली तो वे अपने गुरु को वापस लाने के लिए गए। इस दौरान हनुमान ने अपना रूप बदलकर गोरखनाथ का मार्ग रोक लिया, जिसके बाद दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ और दोनों में से कोई नहीं जीता। इसके बाद हनुमान जी अपने ने असली रूप में आकर गुरु गोरखनाथ से वरदान मांगने को कहा। ऐसे में गुरु गोरखनाथ ने हनुमान से इसी जगह पर उनके पहरेदार के रूप में रहने की प्रार्थना की थी।

--आईएएनएस

एनएस/पीयूष