शिवसेना चुनाव चिन्ह विवाद : सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के फैसले पर उठाए सवाल, शिंदे गुट ने बहुमत के आधार पर दावा किया मजबूत
नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)। शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह ‘धनुष-बाण’ पर अधिकार को लेकर उद्धव ठाकरे गुट की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान गुरुवार को अहम बहस हुई। सुनवाई में एकनाथ शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि पार्टी के सांसदों, विधायकों, संगठनात्मक इकाइयों और कार्यकर्ताओं का बहुमत शिंदे गुट के साथ है, इसलिए चुनाव आयोग का फैसला सही था।
कौल ने अदालत को बताया कि शिवसेना के 18 सांसदों में से 13 सांसद शिंदे गुट के साथ थे। इसके अलावा विधायकों का बहुमत भी उनके पक्ष में था। उन्होंने कहा कि संगठन और कार्यकर्ताओं के समर्थन से जुड़े शपथपत्र चुनाव आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे, जिन पर विचार करने के बाद आयोग ने धनुष-बाण चुनाव चिन्ह और पार्टी पर अधिकार संबंधी फैसला सुनाया था।
नीरज किशन कौल ने दलील दी कि शिंदे गुट के विधायकों और सांसदों के खिलाफ लंबित या पूर्व में चली अयोग्यता की कार्यवाही का चुनाव चिन्ह विवाद से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि अयोग्यता याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं और पिछली विधानसभा भी अपना कार्यकाल पूरा कर चुकी है। अब नई विधानसभा का गठन हो चुका है।
उन्होंने कहा कि यदि चुनाव आयोग को अयोग्यता संबंधी मामलों के अंतिम निपटारे तक इंतजार करना पड़े, तो ऐसे विवादों का समाधान अनिश्चितकाल तक टल सकता है। किसी अन्य संवैधानिक प्राधिकरण के समक्ष लंबित कार्यवाही के आधार पर चुनाव आयोग की प्रक्रिया नहीं रोकी जा सकती।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए कहा कि न्यायिक समीक्षा में अदालत को यह देखना होता है कि चुनाव आयोग ने अपने विवेक का उचित उपयोग किया या नहीं।
उन्होंने कहा कि यह जांचना जरूरी है कि आयोग ने सभी संभावित विकल्पों पर विचार किया था या नहीं। जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि आयोग अस्थायी चुनाव चिन्ह देने जैसे विकल्प पर भी विचार कर सकता था। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने अयोग्यता की कार्यवाही लंबित रहने के बावजूद "विधायी बहुमत" को प्रमुख आधार क्यों माना, इसके कारणों का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया।
जस्टिस बागची ने कहा कि संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) लागू होने के बाद व्यक्तिगत उम्मीदवारों की तुलना में राजनीतिक दल की पहचान और संरक्षण अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
उन्होंने कहा कि जब कोई जनप्रतिनिधि पार्टी छोड़ता है, तो यह सवाल उठता है कि क्या वह मूल पार्टी की विचारधारा और पहचान को अपने साथ ले जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि दल-बदल विरोधी कानून के वर्तमान ढांचे में पार्टी की पहचान को संरक्षित रखना एक महत्वपूर्ण संवैधानिक उद्देश्य है।
जस्टिस बागची ने सुभाष देसाई मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि संविधान पीठ ने माना था कि पार्टी का व्हिप पार्टी नेतृत्व द्वारा नियुक्त किया जाता है, न कि विधायकों द्वारा। ऐसे में यदि कोई समूह अपना अलग व्हिप नियुक्त करता है, तो यह अयोग्यता संबंधी कार्यवाही में विचारणीय पहलू हो सकता है। अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करते समय इन तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान कौल ने कहा कि चुनाव आयोग ने केवल सीटों की संख्या ही नहीं, बल्कि दल को मिले कुल वोटों को भी आधार बनाया था।
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि ये वोट उस समय के "अविभाजित शिवसेना" को मिले थे। उन्होंने सवाल किया कि पार्टी में विभाजन के बाद यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि मतदाता ने वोट उम्मीदवार को दिया था या पार्टी को।
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग का निष्कर्ष काफी हद तक इस अनुमान पर आधारित था कि मतदाताओं ने उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान किया था, जबकि विभाजन के बाद यह आकलन करना आसान नहीं है कि मतदाता की निष्ठा उम्मीदवार के साथ थी या पार्टी के साथ।
कौल ने दलील दी कि सुभाष देसाई मामले में की गई टिप्पणियां चुनाव चिन्ह आदेश के तहत चुनाव आयोग के लिए बाध्यकारी निर्देश नहीं हैं। यदि उस फैसले में अयोग्यता की कार्यवाही लंबित रहने के बावजूद विधायी बहुमत के आधार को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया, तो चुनाव आयोग उसे एक वैध विकल्प के रूप में अपना सकता है।
वहीं, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि क्या सुभाष देसाई फैसले की संबंधित टिप्पणियां केवल 10वीं अनुसूची के संदर्भ तक सीमित थीं या उनका प्रभाव चुनाव आयोग की कार्यवाही पर भी पड़ता है। उन्होंने यह भी सवाल किया कि क्या उस फैसले ने यह तर्क खारिज कर दिया था कि अयोग्यता कार्यवाही लंबित होने के बावजूद चुनाव आयोग अपनी प्रक्रिया जारी रख सकता है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि वह चुनाव आयोग द्वारा अपनाए गए "विधायी बहुमत" के मापदंड की गहन जांच करेगी और यह भी देखेगी कि क्या आयोग ने संवैधानिक मूल्यों तथा दल-बदल विरोधी कानून की भावना को ध्यान में रखते हुए फैसला लिया था। सुनवाई आगे भी जारी रहेगी।
--आईएएनएस
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