शिशु सुरक्षा दिवस : सही पोषण और समय पर टीकाकरण से सुरक्षित होगा बच्चों का भविष्य
नई दिल्ली, 6 नवंबर (आईएएनएस)। बच्चे किसी भी देश का भविष्य होते हैं, लेकिन आज भी कई ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य, पोषण और देखभाल को लेकर पर्याप्त जागरूकता का अभाव है। ऐसे इलाकों में लोगों को शिशुओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों और बीमारियों से बचाव के बारे में शिक्षित करने की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से हर वर्ष 7 नवंबर को 'शिशु सुरक्षा दिवस' मनाया जाता है, ताकि नवजात शिशुओं की बेहतर देखभाल और उनके स्वस्थ भविष्य को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाई जा सके।
यह दिन नवजात शिशुओं और बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और भलाई के बारे में लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य शिशुओं का उचित स्वास्थ्य देखभाल, सही पोषण और टीकाकरण के जरिए शिशु मृत्यु दर को कम करना है।
यह दिन इस बात पर जोर देता है कि बच्चों की सुरक्षा केवल डॉक्टरों या सरकार की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज और परिवार की जिम्मेदारी है। इस दिवस की शुरुआत 1990 के दशक में यूरोपीय देशों द्वारा की गई थी, जिसके बाद से हर साल यह दिवस विश्वस्तर पर मनाया जा रहा है।
शिशु सुरक्षा दिवस पर विभिन्न कार्यक्रम और समारोह आयोजित कर माता-पिता के बीच इस बात को लेकर जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जाता है कि बच्चे के जन्म के साथ ही कई बड़ी जिम्मेदारियां भी आती हैं, जो बच्चे के स्वास्थ्य और उसके सुरक्षित भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस दिन बच्चों को समय पर बचाव के टीके लगवाने, विटामिन 'ए' देने और उन्हें संतुलित पोषण उपलब्ध कराने पर जोर दिया जाता है।
2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की कुल आबादी में 0 से 6 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों की हिस्सेदारी 13 प्रतिशत से ज्यादा थी। वहीं, कुल जनसंख्या का 30.76 प्रतिशत हिस्सा 0 से 14 वर्ष के बच्चों का था।
रिपोट्स के मुताबिक, भारत में प्रति वर्ष लगभग 2.3 करोड़ से 2.5 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं। देश में हर दिन लगभग 63,000 से 72,000 के बीच शिशु पैदा होते हैं। हर घंटे करीब 2,630 से 2,650 बच्चे जन्म लेते हैं।
--आईएएनएस
डीके/वीसी
