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शराबबंदी पर एनसीएईआर की रिपोर्ट से बिहार में छिड़ी नई बहस

पटना, 12 अगस्त (आईएएनएस)। बिहार में पूर्ण शराबबंदी के करीब एक दशक बाद एक शोध रिपोर्ट ने इस नीति को लेकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। देश के प्रमुख आर्थिक शोध संस्थानों में शामिल नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की एक स्टडी में बिहार में पूर्ण शराबबंदी खत्म कर नियंत्रित तरीके से शराब की बिक्री शुरू करने और आबकारी कर व्यवस्था बहाल करने की सिफारिश की गई है।
 

पटना, 12 अगस्त (आईएएनएस)। बिहार में पूर्ण शराबबंदी के करीब एक दशक बाद एक शोध रिपोर्ट ने इस नीति को लेकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। देश के प्रमुख आर्थिक शोध संस्थानों में शामिल नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की एक स्टडी में बिहार में पूर्ण शराबबंदी खत्म कर नियंत्रित तरीके से शराब की बिक्री शुरू करने और आबकारी कर व्यवस्था बहाल करने की सिफारिश की गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा होने पर राज्य के अपने राजस्व में करीब 14 से 15 फीसदी तक की वृद्धि हो सकती है। रिपोर्ट में शराबबंदी के बाद अवैध शराब की तस्करी, दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों का भी उल्लेख किया गया है। इसके बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या भाजपा के नेतृत्व वाली सम्राट चौधरी सरकार शराबबंदी को खत्म करने की दिशा में कदम उठाएगी और क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) इसके लिए तैयार होगी।

हालांकि, सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर फिलहाल शराबबंदी खत्म करने को लेकर कोई स्पष्ट सहमति दिखाई नहीं दे रही है। जदयू की ओर से शराबबंदी की समीक्षा या इसे समाप्त करने के सवाल को खारिज किया गया है। शराबबंदी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत और सामाजिक सुधार के प्रमुख एजेंडे का हिस्सा रही है। अप्रैल 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं की मांग और सामाजिक सुधार को आधार बनाकर बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी।

इसके बाद यह नीति उनकी सरकार की प्रमुख पहचान बन गई। शराबबंदी लागू होने के बाद से ही अवैध शराब की तस्करी और कानून के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। सत्ता पक्ष के कुछ नेता भी समय-समय पर इसकी समीक्षा और प्रभावी क्रियान्वयन की मांग करते रहे हैं। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी लंबे समय से शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन पर सवाल उठाते रहे हैं। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद उन्होंने गुजरात की तर्ज पर बिहार में शराबबंदी कानून लागू करने की बात कही है।

वहीं, राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने भी शराबबंदी कानून को लेकर सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि बिहार में शराबबंदी बिना किसी सर्वे के लागू की गई थी और वह खुद इसके गवाह हैं। उन्होंने नेपाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमाओं से शराब की तस्करी रोकने के लिए सरकार से गंभीर कार्रवाई की मांग की। भाई वीरेंद्र ने अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि शराब की बड़ी खेप में कार्रवाई के नाम पर कुछ ही ट्रकों को पकड़कर उपलब्धि दिखाई जाती है।

इधर, भाजपा प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने कहा कि विभिन्न शोध संस्थानों की रिपोर्ट समय-समय पर सामने आती हैं और बिहार सरकार सभी विषयों पर विचार करती है। उन्होंने कहा कि शराबबंदी और पूर्ण शराबबंदी का फैसला सामूहिक निर्णय था और 2016 में लगभग सभी राजनीतिक दलों ने इसका समर्थन किया था। उन्होंने कहा कि शराबबंदी की समय-समय पर समीक्षा होती रही है और सामने आ रही नई रिपोर्टों की भी समीक्षा की जाएगी। आगे क्या निर्णय लिया जाना है, यह कैबिनेट का सामूहिक फैसला होगा।

कुंतल कृष्ण ने कहा कि बिहार की जनता ने दो आम चुनावों में पूर्ण शराबबंदी के मुद्दे पर अपना समर्थन दिया है और यह भी विचार करने योग्य तथ्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू है। ऐसे में इस रिपोर्ट ने शराबबंदी को लेकर आर्थिक फायदे-नुकसान, सामाजिक प्रभाव और राजनीतिक प्रतिबद्धता के बीच नई बहस जरूर शुरू कर दी है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार इस शोध के निष्कर्षों को किस तरह देखती है और भविष्य में शराबबंदी की नीति को लेकर क्या फैसला लिया जाता है।

--आईएएनएस

एमएनपी/एएस