क्या पाक पीएम शहबाज ने कबूला कि आतंकियों को उनके मुल्क में बसाया गया?
नई दिल्ली, 2 नवंबर (आईएएनएस)। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का एक बयान साबित करता है कि आतंकियों को आश्रय देने में उनका मुल्क हमेशा आगे रहा है। ये कबूलनामा है जिसने आतंकवाद विरोधी नीति, पिछली सरकारों की भूमिका और सुरक्षा व्यवस्था पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। शहबाज ने स्वीकार किया है कि 2019 और 2020 में अफगानिस्तान से आतंकियों को वापस लाकर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में बसाया गया था।
उन्होंने दावा किया कि इसके बाद देश में आतंकवाद की घटनाओं में फिर तेजी आई और पाकिस्तान को भारी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम की जिम्मेदारी उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार पर डाल दी।
प्रधानमंत्री का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करता रहा है। अब खुद मुल्क के वजीर ए आजम यह कबूल कर रहे हैं कि आतंकवादी पाकिस्तान लौटे और वहां उन्हें फिर से बसाया गया। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इस प्रक्रिया में कितने लोग शामिल थे, उन्हें किस स्तर पर अनुमति दी गई और सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका क्या थी।
शहबाज शरीफ ने 31 अक्टूबर को पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के खैबर पख्तूनख्वा (प्रांत में हाल ही में आपातकाल लगाया गया) संसदीय दल और पार्टी पदाधिकारियों की बैठक को संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा, "नवाज शरीफ के कार्यकाल में सामूहिक प्रयासों से आतंकवाद को काफी हद तक खत्म कर दिया गया था। 2017-18 तक हालात में सुधार हुआ था, लेकिन 2019 और 2020 में आतंकवादियों की वापसी और उनके पुनर्वास के कारण सुरक्षा स्थिति फिर बिगड़ गई।"
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई कर ली थी तो फिर आतंकवादियों को वापस लाने और बसाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह केवल राजनीतिक फैसला था या इसके पीछे किसी तरह की सुरक्षा रणनीति काम कर रही थी? और अगर यह फैसला लिया गया तो क्या देश की खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा प्रतिष्ठान को इसकी जानकारी नहीं थी?
शहबाज ने इस पूरे मामले में इमरान खान की तत्कालीन सरकार को जिम्मेदार ठहराया। लेकिन पाकिस्तान की राजनीति में सेना और सुरक्षा प्रतिष्ठान की प्रभावशाली भूमिका को देखते हुए यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि आतंकवादियों की वापसी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर केवल निर्वाचित सरकार की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त है या नहीं। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इसका कोई विस्तृत जवाब नहीं दिया।
शहबाज शरीफ ने खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद से निपटने के लिए उपलब्ध कराए गए वित्तीय संसाधनों पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, "2010 के राष्ट्रीय वित्त आयोग (एनएफसी) पुरस्कार के तहत प्रांत को अतिरिक्त एक प्रतिशत वित्तीय हिस्सा दिया गया था। इस व्यवस्था के तहत खैबर पख्तूनख्वा को अब तक करीब 800 अरब पाकिस्तानी रुपये मिल चुके हैं।"
प्रधानमंत्री ने सवाल किया कि इतनी बड़ी रकम मिलने के बावजूद प्रांत में कितने सेफ सिटी प्रोजेक्ट स्थापित किए गए? आतंकवाद निरोधक विभाग (सीटीडी) को कितना मजबूत किया गया? पुलिस को आधुनिक हथियार, तकनीक और प्रशिक्षण देने के लिए कितने संसाधन लगाए गए?
उन्होंने पुलिस में हजारों पद खाली रहने का भी मुद्दा उठाया। पाकिस्तान टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, केपी में करीब 8,000 पुलिस पद खाली होने की बात कही गई। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस प्रांत में आतंकवाद का खतरा लगातार बना हुआ है, वहां पुलिस बल को पर्याप्त संख्या और संसाधनों से लैस करने में इतनी देरी क्यों हुई?
यहां शहबाज के बयान से एक और विरोधाभास सामने आता है। एक तरफ उनकी सरकार आतंकवादियों की वापसी के लिए पिछली सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है, दूसरी तरफ वह उसी प्रांत को मिले 800 अरब रुपये के इस्तेमाल पर सवाल उठा रही है। लेकिन आतंकवादियों की वापसी के समय केंद्र में कौन था, सुरक्षा प्रतिष्ठान की क्या भूमिका थी और पुनर्वास की प्रक्रिया की निगरानी किसने की, इन सवालों का जवाब अभी भी सामने नहीं आया है।
शहबाज ने आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की लंबी लड़ाई का जिक्र करते हुए कहा कि देश ने इस दौरान करीब 80 हजार लोगों की जान गंवाई और 150 से 200 अरब डॉलर तक का आर्थिक नुकसान उठाया। उन्होंने पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए हमले को याद करते हुए कहा कि मासूम बच्चों की हत्या पाकिस्तान के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में शामिल है।
उन्होंने खैबर पख्तूनख्वा के लोगों, पुलिस, सेना और सुरक्षा बलों के बलिदान को भी याद किया। उनका कहना था कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई किसी एक राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि पूरे देश की सामूहिक जिम्मेदारी है।
लेकिन यदि आतंकवाद के खिलाफ इतनी बड़ी कीमत चुकाने के बाद भी आतंकवादियों की वापसी और पुनर्वास की नौबत आई तो पाकिस्तान की पिछली सुरक्षा नीति की समीक्षा भी जरूरी है। केवल राजनीतिक दलों पर आरोप लगाकर इस सवाल से बचा नहीं जा सकता कि आतंकवादियों को दोबारा पैर जमाने का अवसर कैसे मिला।
शहबाज शरीफ के आरोपों पर पीटीआई ने पलटवार किया है। पार्टी के केंद्रीय सूचना सचिव शेख वकास अकरम ने कहा, "प्रधानमंत्री को लोकतंत्र और शासन व्यवस्था पर उनकी पार्टी को उपदेश देने का नैतिक अधिकार नहीं है।" उन्होंने संघीय सरकार पर प्रांत की बिगड़ती सुरक्षा स्थिति की जिम्मेदारी निर्वाचित प्रांतीय सरकार पर डालने का आरोप लगाया।
पीटआई का दावा है कि इमरान खान के कार्यकाल में खैबर पख्तूनख्वा में शांति और स्थिरता बेहतर थी। पार्टी ने यह भी कहा कि संघीय सरकार ने आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए प्रांतीय प्रशासन को जरूरी संसाधन और उपकरण उपलब्ध नहीं कराए।
शहबाज शरीफ ने खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल और गवर्नर शासन लागू करने के फैसले को भी अपरिहार्य बताया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के सामने प्रांत में बिगड़ती सुरक्षा और प्रशासनिक स्थिति को देखते हुए कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था।
हालांकि, इस फैसले को लेकर पीटीआई पहले ही संघीय सरकार पर राजनीतिक अधिकारों और प्रांतीय स्वायत्तता को कमजोर करने का आरोप लगा चुकी है।
भारत लंबे समय से पाकिस्तान की जमीन से संचालित आतंकवादी नेटवर्क और सीमा पार आतंकवाद को लेकर चिंता जताता रहा है। ऐसे में शरीफ का यह बयान एक बार फिर उस बुनियादी सवाल को सामने लाता है कि क्या पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ वास्तव में अपनी जवाबदेही तय करने को तैयार है? और ऐसा मुल्क जिसने आतंकी संगठनों को फलने फूलने और बसने का पूरा मौका दिया, क्या वह अपनी नीतियों की खामियों को स्वीकार करेगा?
--आईएएनएस
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