सतीश धवन : एक ऐसे वैज्ञानिक, जो बने भारत के अंतरिक्ष भविष्य के वास्तुकार
नई दिल्ली, 24 सितंबर (आईएएनएस)। 1920 में जब भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा था, तब श्रीनगर में एक ऐसे शख्सियत का जन्म हुआ, जिसे नियति ने भारत के अंतरिक्ष भविष्य का वास्तुकार बनाना तय किया था। सतीश धवन का नाम तो आपने सुना होगा, लेकिन उनकी कहानी सिर्फ एक वैज्ञानिक की नहीं, एक दूरदर्शी, एक शिक्षक और एक राष्ट्र-निर्माता की कहानी है।
सतीश धवन का जन्म 25 सितंबर 1920 को हुआ था। उनके पिता लाहौर में जज थे, लेकिन बेटे का मन कानून की किताबों में नहीं, हवा में उड़ने वाले सवालों में लगता था। लाहौर से उन्होंने गणित और एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। फिर अमेरिका में कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से पीएचडी की। वहां उनके गाइड दुनिया के महान वैज्ञानिक थियोडोर वॉन कार्मन थे।
सतीश धवन को 1950 के दशक में अमेरिका में नासा जैसी संस्था में काम करने का सुनहरा मौका, बहुत अच्छी सैलरी और आलीशान जिंदगी जीने का अवसर मिल रहा था, लेकिन 1951 में वह सब छोड़कर भारत लौट आए। उन्हें लगा कि उनका ज्ञान अमेरिका का नहीं, भारत के काम आना चाहिए।
यह वह दौर था जब भारत में सुई तक आयात होती थी, और एक शख्स रॉकेट बनाने का सपना देख रहा था। वे बेंगलुरु में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) आए। एक ऐसा संस्थान जो तब मुश्किल से चल रहा था। धवन ने वहां एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग विभाग को खड़ा किया। वे सिर्फ पढ़ाते नहीं थे, वे सिखाते थे कि कैसे सोचा जाए।
उनकी क्लास में फॉर्मूले से ज्यादा सवाल होते थे। वे हमेशा कहते थे कि 'किसी भी समस्या को हल करने से पहले, उसे ठीक से परिभाषित करना सीखो।' असली कहानी शुरू होती है 1972 में। डॉ. विक्रम साराभाई का असामयिक निधन हो गया। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम नेतृत्वहीन हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने सवाल था, 'इस सपने को कौन संभालेगा?' और उन्होंने सतीश धवन को बुलाया।
धवन ने इसरो के अध्यक्ष का पद संभाला, लेकिन एक शर्त पर कि वे आईआईएससी में पढ़ाना नहीं छोड़ेंगे। वे हफ्ते में दो दिन बेंगलुरु में पढ़ाते थे और बाकी दिन अंतरिक्ष कार्यक्रम देखते थे। एक वैज्ञानिक जो सत्ता से नहीं, क्लासरूम से जुड़ा रहना चाहता था।
देखते ही देखते उनके नेतृत्व में भारत ने वह कर दिखाया जो असंभव लगता था। 1975 में पहला उपग्रह आर्यभट्ट, 1979 में भास्कर-1 और 1980 में तीसरा उपग्रह रोहिणी आरएस-1 लॉन्च किए गए। खास तौर पर तीसरा उपग्रह भारत ने खुद के रॉकेट एसएलवी-3 से लॉन्च किया। दुनिया हैरान थी। एक देश, जिसकी साइकिल पर रॉकेट के पुर्जे ले जाने की तस्वीरें दुनिया देख चुकी थी, वह अब अंतरिक्ष क्लब में शामिल हो गया था।
धवन की महानता सिर्फ सफलता में नहीं, असफलता को संभालने में थी। 10 अगस्त 1979 को जब पहला एसएलवी-3 मिशन फेल हुआ और रॉकेट बंगाल की खाड़ी में गिर गया, तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूरी दुनिया के सामने सतीश धवन खुद आए। उन्होंने पूरी जिम्मेदारी ली, लेकिन जब 18 जुलाई 1980 को वही मिशन सफल हुआ, तो उन्होंने अपने युवा वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम को आगे कर दिया और कहा, "आज बात ये करेंगे।"
उन्होंने श्रीहरिकोटा में लॉन्चिंग स्टेशन बनवाया, जो आज उनके नाम पर है, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र। 3 जनवरी 2002 को उनका निधन हो गया।
--आईएएनएस
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