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साहिबगंज में 14 साल से अधूरी ‘मेधा जलापूर्ति योजना’ पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से पूछा- जहरीले पानी से कब मिलेगी मुक्ति

रांची, 27 अगस्त (आईएएनएस)। झारखंड के साहिबगंज जिले के ग्रामीण इलाकों में साफ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए वर्ष 2012 में स्वीकृत ‘मेधा पेय जलापूर्ति योजना’ 14 साल बाद भी जमीन पर नहीं उतर सकी है। भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की खतरनाक मात्रा के बीच ग्रामीणों को शुद्ध पानी उपलब्ध कराने वाली योजना के लंबे समय से लंबित रहने पर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
 

रांची, 27 अगस्त (आईएएनएस)। झारखंड के साहिबगंज जिले के ग्रामीण इलाकों में साफ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए वर्ष 2012 में स्वीकृत ‘मेधा पेय जलापूर्ति योजना’ 14 साल बाद भी जमीन पर नहीं उतर सकी है। भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की खतरनाक मात्रा के बीच ग्रामीणों को शुद्ध पानी उपलब्ध कराने वाली योजना के लंबे समय से लंबित रहने पर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।

कोर्ट ने राज्य सरकार से योजना की मौजूदा स्थिति और इसे शुरू करने की समय-सीमा स्पष्ट करने को कहा है। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने गुरुवार को योजना से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के प्रधान सचिव को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

अदालत ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि ग्रामीणों को प्रदूषित भूजल से राहत दिलाने वाली इस योजना को कब तक शुरू किया जाएगा। सुनवाई के दौरान प्रार्थी सिद्धेश्वर मंडल की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि साहिबगंज के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। इसी समस्या के समाधान के लिए वर्ष 2012 में मेधा पेय जलापूर्ति योजना को मंजूरी दी गई थी। योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित और शुद्ध पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करना था। हालांकि, मंजूरी मिलने के करीब डेढ़ दशक बाद भी इसका लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पाया है।

प्रार्थी की ओर से अदालत को यह भी बताया गया कि क्षेत्र के भूजल की गुणवत्ता को लेकर स्थिति बेहद गंभीर है। झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच रिपोर्ट में भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की मौजूदगी का उल्लेख किया गया है। इन तत्वों की अधिक मात्रा लंबे समय तक इस्तेमाल किए जाने पर लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।

याचिका में कहा गया है कि एक तरफ ग्रामीण प्रदूषित भूजल पर निर्भर हैं और दूसरी ओर उन्हें सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए स्वीकृत योजना वर्षों से लंबित है। ऐसे में योजना को लेकर सरकारी स्तर पर हुई प्रगति और इसके क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं की जानकारी अदालत के समक्ष रखे जाने की मांग की गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने विभाग के प्रधान सचिव से सिर्फ जवाब ही नहीं, बल्कि योजना को लेकर स्पष्ट स्थिति और आगे की कार्ययोजना बताने को कहा है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को निर्धारित की है।

--आईएएनएस

एसएनसी/डीएससी