सहदेवी: आयुर्वेद की चमत्कारी जड़ी-बूटी, किडनी से लेकर लिवर तक की रक्षक
नई दिल्ली, 12 जनवरी (आईएएनएस)। सहदेवी आयुर्वेद की उन खास जड़ी-बूटियों में से एक है, जिसे सदियों से प्राकृतिक औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह भारत के कई हिस्सों में आसानी से पाई जाती है और इसके पत्ते, जड़ और फूल औषधीय गुणों से भरपूर माने जाते हैं।
आयुर्वेद में सहदेवी को मूत्रवर्धक, पथरी विरोधी और शरीर को अंदर से साफ करने वाली जड़ी-बूटी कहा गया है। यह शरीर से गंदगी निकालने और अंगों को स्वस्थ रखने का काम करती है। खासतौर पर किडनी और लिवर के लिए इसे बहुत फायदेमंद माना जाता है, इसलिए इसे सेहत की रक्षक जड़ी-बूटी भी कहा जाता है।
किडनी और मूत्र संबंधी समस्याओं में सहदेवी का उपयोग काफी प्रचलित है। पेशाब में जलन, बार-बार पेशाब आना, मूत्र रुक-रुक कर आना या किडनी में पथरी जैसी समस्याओं में यह सहायक मानी जाती है। यह मूत्र प्रवाह को बेहतर बनाती है और मूत्राशय को साफ रखने में मदद करती है। आयुर्वेदिक मान्यताओं के अनुसार सहदेवी शरीर में जमा विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करती है, जिससे किडनी पर पड़ने वाला दबाव कम होता है और उनका काम बेहतर तरीके से होता है।
लिवर की सेहत के लिए भी सहदेवी को उपयोगी माना गया है। यह लिवर की कार्यक्षमता को बढ़ाने और शरीर को डिटॉक्स करने में मदद करती है। जब लिवर ठीक से काम करता है तो पाचन, त्वचा और ऊर्जा स्तर अपने आप बेहतर होने लगते हैं।
इसके अलावा, सहदेवी इम्युनिटी बढ़ाने में भी सहायक मानी जाती है। नियमित और सही मात्रा में सेवन करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और बार-बार होने वाले संक्रमण से बचाव होता है। पाचन से जुड़ी समस्याओं जैसे गैस, अपच, पेट फूलना और पेट की जलन में भी इसका उपयोग लाभकारी बताया जाता है।
सहदेवी में सूजन कम करने और दर्द से राहत देने वाले गुण भी पाए जाते हैं। जोड़ों के दर्द, मांसपेशियों की सूजन और गठिया समस्याओं में इसका इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि सहदेवी जैसी दिखने वाली कई दूसरी खरपतवार भी होती हैं, जिनका सेवन नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए सही पहचान और किसी आयुर्वेदिक विशेषज्ञ की सलाह के साथ ही इसका उपयोग करना सबसे सुरक्षित और फायदेमंद माना जाता है।
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