सफलता के पीछे दौड़ रहे युवा शांति खो रहे हैं, इसलिए संवाद जरूरी: आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण
उज्जैन, 18 सितंबर (आईएएनएस)। उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद में शुक्रवार को विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श हुआ। सेवाज्ञ संस्थानम के संरक्षक आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण महाराज ने कहा कि युवाओं को अपने जीवन को मूल्यवान बनाने की समझ विकसित करनी चाहिए।
मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि एक अच्छा जीवन बनाने का दबाव आज इतना बढ़ गया है कि युवाओं के लिए अपनी प्राथमिकताएं तय करना कठिन हो गया है। युवाओं में यह सोच विकसित हो गई है कि किसी भी तरह सफल होना है, लेकिन सफलता हासिल करने के बाद भी उन्हें शांति नहीं मिलती। इसलिए युवाओं के साथ संवाद जरूरी है और धर्म संसद जैसे कार्यक्रम आगे भी आयोजित होने चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि आपने किसी नाजायज तरीके से कोई सिद्धि प्राप्त की है, तो वह आपको सिद्ध नहीं बनने देती। हर स्थिति में संतुलन बनाए रखने के लिए सबसे पहले हमें अपना संतुलन बनाए रखना होगा। अगर हमें कोई वजन उठाना है तो पहले हमें खुद को स्थिर करना होगा। अगर हमें किसी चीज को धक्का देकर दूर ले जाना है, तो हमारे पैर जमीन पर मजबूती से जमे होने चाहिए। हम इसे बहुत व्यावहारिक तरीके से समझ सकते हैं।
उन्होंने कहा कि परंपरा, प्राचीनता और आधुनिकता के बीच कोई अंतर या टकराव नहीं है। जब हम किसी एक चीज पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो बाकी सब कुछ उसके विपरीत लगने लगता है। हम किसी चीज को तब तक नापसंद नहीं कर सकते, जब तक कि हम किसी दूसरी चीज को पसंद न करने लगें। जैसे ही हम अपनी पसंद से जुड़ जाते हैं, हमारी नापसंद भी सामने आने लगती है।
आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण महाराज ने कहा कि युवाओं को केवल कीमत चुकाकर चीजें खरीदने की सोच से आगे बढ़कर अपने जीवन को मूल्यवान बनाने की समझ विकसित करनी चाहिए। यह स्वाभाविक है कि जब हम किसी चीज की इच्छा करते हैं तो उसकी कीमत चुकाने में सक्षम बनना चाहते हैं। यह एक भौतिकवादी दृष्टिकोण है, जो पूरी दुनिया में मौजूद है। भारत का दृष्टिकोण यह है कि हमारे जीवन में मूल्यों का भाव होना चाहिए, जो हमारे कार्यों, आचरण, विश्वासों और जीवन जीने के तरीके में दिखाई दे। इससे हम दुनिया के लिए अधिक मूल्यवान और लाभकारी बन सकते हैं। व्यक्ति का निर्माण इस तरह होना चाहिए कि वह लोगों के हित के अनुरूप ढल सके। यही भारत की दृष्टि है। धर्म का अर्थ ऐसा विकास नहीं है, जिसमें एक व्यक्ति का उत्थान दूसरे के लिए दबाव या उसके पतन का कारण बने।
उन्होंने कहा कि एक का विकास दूसरे के लिए दबाव का कारण नहीं बन सकता। एक का उत्थान दूसरे के पतन से निर्मित नहीं होना चाहिए। व्यक्ति को प्रभाव के बजाय स्वभाव में जीने योग्य बनना चाहिए। जब हम युवाओं और विकास की बात करते हैं, तो उसका अर्थ अपने स्वभाव को पहचानकर उसके अनुरूप जीने की प्रतिबद्धता से होना चाहिए।
आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि एक समय ऐसा था, जब सरस्वती पूजा नहीं कर सकते थे। उन्होंने कहा कि अब हरियाणा के विद्यालयों में गीता पढ़ाई जाएगी। एक दिन ऐसा भी था, जब वंदे मातरम् को लेकर लोग असहज होते थे। अब तो कानून बन गया है और गीत के सभी छंद गाने होंगे। युवा धर्म संसद जैसे आयोजन होने चाहिए और इनका निरंतर आयोजन किया जाना चाहिए।
--आईएएनएस
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