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सदन में अधिकतम कार्य-दिवस और सार्थक बहस से मजबूत होगा लोकतंत्र: वासुदेव देवनानी (आईएएनएस साक्षात्कार)

लखनऊ, 21 जनवरी (आईएएनएस)। अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (एआईपीओसी) के मंच से देशभर की विधानसभाओं के संचालन, अनुशासन और जवाबदेही को लेकर गहन मंथन चल रहा है। इसी सम्मेलन के दौरान राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने आईएएनएस से विशेष बातचीत में कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती के लिए सदनों का अधिक समय तक चलना, सदस्यों की सक्रिय भागीदारी और तकनीक का व्यापक उपयोग बेहद जरूरी है।
 
सदन में अधिकतम कार्य-दिवस और सार्थक बहस से मजबूत होगा लोकतंत्र: वासुदेव देवनानी (आईएएनएस साक्षात्कार)

लखनऊ, 21 जनवरी (आईएएनएस)। अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (एआईपीओसी) के मंच से देशभर की विधानसभाओं के संचालन, अनुशासन और जवाबदेही को लेकर गहन मंथन चल रहा है। इसी सम्मेलन के दौरान राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने आईएएनएस से विशेष बातचीत में कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती के लिए सदनों का अधिक समय तक चलना, सदस्यों की सक्रिय भागीदारी और तकनीक का व्यापक उपयोग बेहद जरूरी है।

उन्होंने साफ कहा कि 'सदन जितना अधिक चलेगा, उतनी ही प्रभावी ढंग से जनता के मुद्दों का समाधान संभव होगा।'

प्रश्न: क्या लोकतंत्र की मजबूती पर भी कुछ विचार-विमर्श हो रहे हैं?

उत्तर: हां, सम्मेलन में दो-तीन अहम सुझावों पर व्यापक सहमति बनी। पहला, देशभर की विधानसभाओं के लिए न्यूनतम कार्यदिवस तय हो। एक न्यूनतम सीमा तय होने से जनता से जुड़े मुद्दों, सवाल-जवाब और विधायी कार्यों को पर्याप्त समय मिलेगा। दूसरा, सदस्यों की उपस्थिति और सहभागिता बढ़ाई जाए। चुनाव जीतकर आने वाले हर जनप्रतिनिधि को सदन में अपनी बात रखने का समय मिलना चाहिए। संवाद, प्रशिक्षण और तार्किक बहस की संस्कृति विकसित कर इसे सुधारा जा सकता है। विधेयकों और विषयों का अध्ययन कर सदन में आने की प्रवृत्ति को भी बढ़ाना होगा।

प्रश्न: विपक्ष लगातार सदन के कम समय को लेकर सवाल उठाता है। क्या यह समस्या सभी राज्यों में है?

उत्तर: यह समस्या लगभग सभी राज्यों में है और यह धीरे-धीरे बढ़ रही है। सदन अनिवार्य रूप से 60 दिन चले यह एक आदर्श स्थिति मानी जाती है। अभी की हालत यह है कि सरकार के विधायी कार्य, विपक्ष का सहयोग और शांतिपूर्ण बहस पर निर्भर है कि सदन कितने दिन चल पाएगा। बहस के हंगामे में बदलने पर स्थगन होने से नुकसान दोनों पक्षों का होता है। राजस्थान में हमने सर्वदलीय बैठकों की शुरुआत की है। सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं।

प्रश्न: हंगामा और बार-बार स्थगन कैसे रोक पाएंगे?

उत्तर: सम्मेलन में इस विषय पर कोई अलग से प्रस्ताव नहीं आया है। अनुभव के आधार पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि गतिरोध का समाधान बहुत आवश्यक है। सदन स्थगन की स्थिति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं को स्पीकर कक्ष में बैठाकर समाधान निकालने का प्रयास किया जा सकता है। हां, यह जरूर है कि यदि गतिरोध जनता के मुद्दे पर है तो समाधान अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन जब मामला राजनीतिक-रणनीति हो, तब कठिनाइयां बढ़ जाती हैं। फिर भी संवाद ही एकमात्र रास्ता है।

प्रश्न: निष्पक्षता और अनुशासन बनाए रखना, एक पीठासीन अधिकारी के लिए तो बहुत चुनौतीपूर्ण होता होगा?

उत्तर: बिलकुल, एक बड़ी चुनौती है। वर्तमान में यह और बढ रही है। बता दूं कि सत्ता और विपक्ष की भूमिकाएं बदलती रहती हैं और साथ ही उनके दृष्टिकोण भी। इसलिए सामूहिक चर्चा के अवसर बढ़ाने आवश्यक हैं। अधिक संवाद के साथ स्वयं के लिए मर्यादाएं तय कर लोकतंत्र की मजबूती में सहयोगी बनाना होगा।

प्रश्न: ई-विधान, डिजिटल कार्यवाही और एआई को लेकर राजस्थान विधानसभा की क्या तैयारी है?

उत्तर: राजस्थान विधानसभा अब पूरी तरह पेपरलेस है। हर सदस्य की टेबल पर आईपैड हैं। 80 फीसद से अधिक विधायक इसका नियमित उपयोग कर रहे हैं। समिति की बैठकों में डिजिटल सिग्नेचर शुरू किए गए हैं। हम गेट पास, पहचान पत्र जैसी व्यवस्थाओं को भी पूरी तरह डिजिटल करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। इसके साथ ही विधानसभा परिसर में एक डिजिटल म्यूजियम बनाया गया है, जिसमें 1952 से अब तक के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को आधुनिक तकनीक के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। राजस्थान में एक और नवाचार किया गया है। विधायक के वक्तव्य को उसी दिन उसका डिजिटल रिकॉर्ड पेन ड्राइव में उपलब्ध करवा रहे हैं।

प्रश्न: मौजूदा राजनीतिक माहौल में क्या विधानसभाएं अपने संवैधानिक दायित्वों का सही निर्वहन कर पा रही हैं?

उत्तर: जी, दायित्वों का निर्वहन हो रहा है। बजट प्रस्तुत होता है, प्रश्नकाल होता है, विधायी प्रक्रिया चलती है। अब इसे और बेहतर, अधिक गंभीर और लंबी बहसों के जरिए जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप बनाने का प्रयास करना ही शेष है। इस दिशा में भी हम प्रयासरत हैं।

प्रश्न: लोकतंत्र और विधानमंडलों की गरिमा को लेकर जनता के लिए आपका कोई संदेश?

उत्तर: हमारे विधायक जनता में से ही चुनकर आते हैं। इसलिए उनका यह दायित्व है कि वह आमजन से जुड़ा रहे। जनता को भी ऐसा ही करना चाहिए। वह भी पूरे पांच साल जागरूक बनी रहे। ऐसा होगा तब सम्बन्धित विधायकों की जवाबदेही स्वतः बढ़ जाएगी।

--आईएएनएस

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