Aapka Rajasthan

एस जयशंकर: ऐसी शख्सियत जिन्हें मनमोहन सिंह के चाहते हुए भी कांग्रेस ने तवज्जो नहीं दी, पीएम मोदी ने बिना चुनाव लड़ाए बनाया विदेश मंत्री

नई दिल्ली, 8 जनवरी (आईएएनएस)। न कोई चुनाव लड़ा और न राजनीति विरासत में मिली, फिर भी सत्ता के शिखर पर बैठकर दुनिया से संबंधों को बनाने की जिम्मेदारी मिल गई। बात हो रही है देश के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की, जिनकी सोच और रणनीति ने भारत की विदेश नीति को ऐसी धार दी है कि दुश्मन देश भी कायल हो गए। इसी काबिलियत पर भरोसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस समय किया, जब एस. जयशंकर को बिना चुनाव लड़ाए ही पूरी दुनिया के साथ रिश्तों को संभालने की जिम्मेदारी सौंप दी गई।
 
एस जयशंकर: ऐसी शख्सियत जिन्हें मनमोहन सिंह के चाहते हुए भी कांग्रेस ने तवज्जो नहीं दी, पीएम मोदी ने बिना चुनाव लड़ाए बनाया विदेश मंत्री

नई दिल्ली, 8 जनवरी (आईएएनएस)। न कोई चुनाव लड़ा और न राजनीति विरासत में मिली, फिर भी सत्ता के शिखर पर बैठकर दुनिया से संबंधों को बनाने की जिम्मेदारी मिल गई। बात हो रही है देश के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की, जिनकी सोच और रणनीति ने भारत की विदेश नीति को ऐसी धार दी है कि दुश्मन देश भी कायल हो गए। इसी काबिलियत पर भरोसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस समय किया, जब एस. जयशंकर को बिना चुनाव लड़ाए ही पूरी दुनिया के साथ रिश्तों को संभालने की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

9 जनवरी 1955 को दिल्ली में जन्मे एस. जयशंकर के अंदर की काबिलियत के लक्षण बचपन से ही दिखने लगे थे। बड़े होकर उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर, इंटरनेशनल रिलेशंस और न्यूक्लियर डिप्लोमेसी में एमए, एम फिल और पीएचडी की। आगे चलकर उनकी यह डिग्री बहुत काम आई। 1977 में इंडियन फॉरेन सर्विस यानी आईएफएस ज्वाइन करके आधिकारिक तौर पर अपना डिप्लोमेसी करियर शुरू किया और दुनिया भर के देशों में मैत्रीपूर्ण कामकाजी संबंधों को बढ़ाया।

जयशंकर की विदेश में पहली पोस्टिंग 1979 से 1981 तक मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास में तृतीय और द्वितीय सचिव (राजनीतिक) के रूप में हुई। 1981 से 1985 तक उन्होंने विदेश मंत्रालय में अवर सचिव (अमेरिका) और नीति नियोजन के रूप में कार्य किया। इसके बाद उन्होंने 1985 से 1988 तक तीन वर्ष वाशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास में प्रथम सचिव के रूप में राजनीतिक मामलों का कार्यभार संभाला, और फिर दो वर्ष श्रीलंका में भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) के प्रथम सचिव और राजनीतिक सलाहकार के रूप में कार्य किया।

1990 में, जयशंकर बुडापेस्ट में वाणिज्य सलाहकार बने। तीन साल इस पद पर रहने के बाद, वे भारत लौट आए जहां उन्होंने पहले विदेश मंत्रालय के पूर्वी यूरोप प्रभाग के निदेशक और फिर भारत के राष्ट्रपति के प्रेस सचिव के रूप में कार्य किया। भारत में इस सेवा के बाद जयशंकर 1996 में उप मिशन प्रमुख के रूप में टोक्यो वापस चले गए। साल 2000 में, उन्हें चेक गणराज्य में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया और उन्होंने 2004 तक प्राग में अपनी सेवाएं दीं।

प्राग में राजदूत के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद जयशंकर एक बार फिर भारत लौट आए, जहां उन्होंने विदेश मंत्रालय में अमेरिका विभाग का नेतृत्व किया। तीन वर्षों तक इस विभाग का नेतृत्व करने के बाद वे 2007 में दो सालों के लिए सिंगापुर में उच्चायुक्त के रूप में सेवा देने के लिए भारत से चले गए। जयशंकर 2009 से 2013 तक चीन में भारत के राजदूत रहे। इसके बाद उनके करियर में कई घटनाक्रम हुए।

2013 में केंद्र में यूपीए 2.0 सरकार थी। लोकसभा चुनावों में अभी लगभग सालभर का समय था, लेकिन उसके पहले यूपीए सरकार को नया विदेश सचिव चुनना था। नामों से बिना विचार विमर्श मनमोहन सिंह के ध्यान में एस जयशंकर का नाम था। भले मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, लेकिन विपक्ष के आरोप थे कि वह सिर्फ नाम के प्रधानमंत्री हैं। बावजूद इसके मनमोहन सिंह एस. जयशंकर को विदेश सचिव बनाने के पक्ष में थे। वह उनकी क्षमता और काबिलियत को शायद अच्छे से समझ चुके थे, लेकिन उनकी बात सरकार के फैसलों में नहीं थी। वरिष्ठता क्रम में सुजाता सिंह के ऊपर होने के कारण एस. जयशंकर का नाम बढ़ाने की मनमोहन सिंह की मंशा भी अधूरी रह गई।

उस साल चर्चाएं रहीं कि विदेश सचिव की नियुक्ति में संगठन का दखल रहा और इसी कारण एस. जयशंकर को नजरअंदाज किया गया था। खबरें रहीं कि सोनिया गांधी ने एस. जयशंकर के मुकाबले सुजाता सिंह को तवज्जो दी थी। इसके पीछे का एक कारण यह भी माना गया कि सुजाता के पिता और पूर्व आईबी चीफ टीवी राजेश्वर के गांधी परिवार के संबंध अच्छे रहे। सुजाता को विदेश सचिव की कुर्सी मिली तो एस. जयशंकर को राजदूत बनाकर अमेरिका भेज दिया गया। कई समाचार लेखों में इस घटनाक्रम का उल्लेख मिलता है।

2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनी और यहां से एस. जयशंकर के लिए भी कई नए दरवाजे खुले। 2015 में भाजपा सरकार ने सुजाता सिंह को उनके कार्यकाल से पहले ही पद से हटा दिया और एस. जयशंकर को विदेश सचिव की जिम्मेदारी दी गई। समाचार लेखों में यह भी जिक्र मिलता है कि जब प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी अपनी पहली अमेरिकी यात्रा पर निकले थे, उसी समय वे एस. जयशंकर से काफी प्रभावित हुए थे।

2018 तक एस. जयशंकर विदेश सचिव के रूप में अपनी जिम्मेदारी संभालते रहे, लेकिन अगला साल यानी 2019 उनके लिए वह अवसर बना, जब विदेश सचिव से सीधे उन्हें विदेश मंत्री बना दिया गया। दिलचस्प यह था कि जब उन्होंने विदेश मंत्री के रूप में शपथ ली थी, उनके ठीक सामने उस समय मनमोहन सिंह बैठे थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल में भी एस. जयशंकर को विदेश मंत्री की जिम्मेदारी दी, जो पिछले पांच साल की कामयाबियों का ईनाम था और नए भारत के भविष्य के लिए एक भरोसा।

--आईएएनएस

डीसीएच/डीकेपी