रूस का सुखोई इंजन ऑफर भारत के लिए गेमचेंजर, चीन पर भरोसे से बचें : हेमंत महाजन
पुणे, 12 सितंबर (आईएएनएस)। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने भारत पहुंचे रूसी राष्ट्रपति पुतिन के सुखोई इंजन ऑफर को रक्षा विशेषज्ञ ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) हेमंत महाजन ने वायुसेना के लिए बड़ा लाभ बताया, तो वहीं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दौरे पर सतर्क रुख अपनाने की सलाह दी।
हेमंत महाजन ने कहा, "रूस के राष्ट्रपति पुतिन ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने भारत आए हैं और इस दौरान उन्होंने रक्षा सहयोग को लेकर अहम पेशकश की है। उन्होंने सुखोई विमानों के लिए नए इंजन की पेशकश की है। भारतीय वायुसेना के बेड़े को देखें तो उसमें सुखोई, जगुआर, मिराज और राफेल जैसे लड़ाकू विमान शामिल हैं, लेकिन सुखोई सबसे आधुनिक विमानों में से एक है और वायुसेना के कुल बेड़े का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा है। किसी भी आधुनिक विमान को समय-समय पर एवियोनिक्स और इंजन क्षमता के लिहाज से अपग्रेड की जरूरत होती है। रूस की यह पेशकश सुखोई के लिए ज्यादा ताकतवर इंजन की है, जो मौजूदा इंजनों की तुलना में 7 प्रतिशत सस्ता भी है और इससे सुखोई विमान की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।"
उन्होंने कहा कि आज सुखोई विमान ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात हैं। अधिक शक्तिशाली इंजन लगने से यह बड़े क्षेत्र को कवर करने में सक्षम होगा, यहां तक कि पूरे तिब्बत क्षेत्र तक इसकी पहुंच हो सकती है। इसका इस्तेमाल अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम जैसे पहाड़ी इलाकों के साथ-साथ देश के पूर्वी और पश्चिमी तटों के समुद्री क्षेत्रों और रेगिस्तानी इलाकों में भी बेहद कारगर तरीके से किया जा सकता है। इसलिए ज्यादा ताकतवर इंजन के साथ सुखोई का अपग्रेड होना हमारे लिए फायदेमंद साबित होगा। इस डील के अन्य पहलू जैसे तकनीक हस्तांतरण को लेकर रूस ने सहमति जताई है। कीमतों की बात करें तो यह अमेरिकी विमानों के मुकाबले काफी कम है और यही इंजन आसानी से फिट भी किया जा सकता है। कुल मिलाकर यह एक अच्छा सौदा है।
शी जिनपिंग के भारत दौरे पर रक्षा विशेषज्ञ हेमंत महाजन ने कहा कि चीनी राष्ट्रपति लंबे समय बाद भारत आए हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि इससे भारत-चीन संबंधों में सुधार हो सकता है। मैं एक रणनीतिक विश्लेषक के तौर पर इस यात्रा को लेकर सतर्क रहूंगा और जमीनी स्तर पर ठोस कदम उठने के बाद ही इस पर भरोसा करूंगा। भारत-चीन संबंधों में सबसे अहम मुद्दा सीमा विवाद है। जब तक सीमा का मुद्दा हल नहीं होता, तब तक दोनों देशों के संबंध नहीं सुधर सकते, क्योंकि चीन सीमा पर 'स्लाइसिंग' यानी धीरे-धीरे जमीन हथियाने की नीति अपनाता है और सीमा के मामले में उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। दूसरा मुद्दा आर्थिक सहयोग का है। आयात-निर्यात के मामले में पिछले 7-8 सालों में भारत सरकार के प्रयासों के बावजूद चीन सिर्फ भारतीय बाजार का लाभ उठाना चाहता है। चीन से भारत का आयात 100 अरब डॉलर से ज्यादा है, जबकि भारत का चीन को निर्यात महज 20 अरब डॉलर के आसपास है।
रक्षा विशेषज्ञ ने कहा कि आयात और निर्यात के बीच का अंतर कम होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। आर्थिक सहयोग तभी बेहतर हो सकता है जब आयात-निर्यात में संतुलन हो। तीसरा, चीन भारत के खिलाफ 'सप्लाई चेन वॉरफेयर' यानी आपूर्ति श्रृंखला को हथियार बनाने की रणनीति अपना रहा है। वह भारत को जरूरी चीजें देने से इनकार कर देता है, जैसे दुर्लभ खनिज तत्वों (रेयर अर्थ एलिमेंट्स) पर उसने प्रतिबंध लगा दिया है। उर्वरक, बोरिंग मशीन जैसी कई चीजें चीन पर्याप्त मात्रा में नहीं दे रहा था। इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जों को लेकर भी वह अड़चनें पैदा कर रहा था। भारतीय कारोबारियों को वीजा देने में भी वह दिक्कतें खड़ी कर रहा था। इसलिए जब तक चीन अपनी बाजारों तक पहुंच नहीं देता और आयात-निर्यात के बीच के भारी अंतर को कम नहीं करता, तब तक यह संबंध स्वस्थ नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा कि चीन लगातार पाकिस्तान की मदद भी करता आ रहा है। इस पर घंटों चर्चा हो सकती है कि वह किस तरह पाकिस्तान का समर्थन करता है, यह भी बंद होना चाहिए। इसके अलावा, चीन अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर, खासकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में, भारत का विरोध करता है, और शीर्ष स्तर पर भी दोनों देशों के बीच संबंध दोस्ताना नहीं हैं। ये सभी चीजें बदलनी होंगी और चीन को भारत को बराबर का और समान रूप से अहम साझेदार मानना होगा, तभी दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार संभव है।
--आईएएनएस
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