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रुद्रप्रयाग में महिला स्वयं सहायता समूह की पहल, हर्बल रंगों का किया जा रहा निर्माण

रुद्रप्रयाग, 1 मार्च (आईएएनएस)। रुद्रप्रयाग में महिला स्वयं सहायता समूह की ओर से हर्बल रंगों का निर्माण किया जा रहा है। इसे तैयार कर जिला मुख्यालय सहित आसपास के बाजार और विकास भवन में उपलब्ध करवाया जा रहा है। इससे जहां महिलाओं को स्वरोजगार का नया आयाम मिल रहा है, वहीं केमिकल रंगों से दूर रहने का संदेश भी दिया जा रहा है। रुद्रप्रयाग के जवाड़ी, कुमोली, मायकोटि, मेदनपुर, ऊखीमठ गांवों में महिलाएं हर्बल रंग बना रही हैं, जिसकी मार्केट में खूब डिमांड है।
 
रुद्रप्रयाग में महिला स्वयं सहायता समूह की पहल, हर्बल रंगों का किया जा रहा निर्माण

रुद्रप्रयाग, 1 मार्च (आईएएनएस)। रुद्रप्रयाग में महिला स्वयं सहायता समूह की ओर से हर्बल रंगों का निर्माण किया जा रहा है। इसे तैयार कर जिला मुख्यालय सहित आसपास के बाजार और विकास भवन में उपलब्ध करवाया जा रहा है। इससे जहां महिलाओं को स्वरोजगार का नया आयाम मिल रहा है, वहीं केमिकल रंगों से दूर रहने का संदेश भी दिया जा रहा है। रुद्रप्रयाग के जवाड़ी, कुमोली, मायकोटि, मेदनपुर, ऊखीमठ गांवों में महिलाएं हर्बल रंग बना रही हैं, जिसकी मार्केट में खूब डिमांड है।

स्वयं सहायता समूह से जुड़ी संगीता कप्रवाण ने बताया कि हमने हर्बल रंग बनाया है। इनमें सारी नेचुरल चीजें हैं और इसकी कीमत 25 रुपए प्रति पैकेट है। उन्होंने कहा कि चेहरा खराब होने के डर से लोग केमिकलयुक्त रंगों का उपयोग नहीं करना चाहते हैं। लोग इन हर्बल रंगों को खरीदें। इससे कोई नकारात्मक असर नहीं होता है।

मोनिका कप्रवाण ने कहा कि हमने अपने घर में जैविक रंग बनाए हैं। उन्होंने बताया कि इन रंगों की बाजार में अधिक डिमांड है। उन्होंने बताया कि इन रंगों में केमिकल नहीं हैं। घर के फूल इत्यादि से रंग को हमने तैयार किया है।

बता दें कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन व ग्रामीण प्रशिक्षण संस्थान की ओर से महिलाओं को प्राकृतिक रंगों को बनाने का प्रशिक्षण दिया गया था। इसके बाद अब महिलाओं ने गांवों में इन रंगों का निर्माण करना शुरू किया है। महिलाओं की ओर से पालक से हरा रंग, हल्दी से पीला रंग, चुकंदर से गुलाबी और लाल और गेंदा फूल से केसरिया रंग बनाया जा रहा है। इन रंगों को बनाकर संदेश दिया जा रहा है कि केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग न किया जाए।

ग्रामीण स्वरोजगार संस्थान के निदेशक व प्रशिक्षक ने कहा कि आगामी होली पर्व पर इन रंगों के बिकने से महिलाओं की आजीविका भी सशक्त होगी। उन्होंने जिले के लोगों से अपील की है कि स्वदेशी और प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें।

ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान के प्रशिक्षक भूपेंद्र रावत ने कहा कि बीते वर्षों में हमने हर्बल कलर बनाने का प्रशिक्षण दिया, जिसमें गांव की महिलाएं हर्बल कलर का निर्माण कर रही हैं। उन्होंने कहा कि त्योहारों पर हर्बल रंगों की बहुत ज्यादा डिमांड होती है। लोग केमिकल का यूज नहीं करना चाहते। इस बार भी विभिन्न स्टॉल के माध्यम से हर्बल रंगों को बेचा जा रहा है।

ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान के निदेशक अनूप कुमार ने कहा कि सभी को बताना चाहता हूं कि संस्थान द्वारा विभिन्न स्वरोजगार का प्रशिक्षण दिया जाता है। त्योहारों पर विशेष उत्पादों का निर्माण किया जाता है।

--आईएएनएस

एसडी/एबीएम