राज खोसला की फिल्म से टूटी आशा पारेख के ‘ग्लैमर गर्ल’ की छवि, आलोचकों को बदलनी पड़ी थी राय
मुंबई, 31 मई (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा जगत में कई ऐसे निर्देशक हुए हैं जिन्होंने कई सितारों को फर्श से अर्श तक पहुंचाया और कई कलाकारों की स्थापित छवि भी बदल दी। ऐसे ही निर्देशक थे राज खोसला, जिन्होंने अपने लंबे करियर में सस्पेंस, सामाजिक, एक्शन और पारिवारिक फिल्मों के जरिए दर्शकों के दिलों पर खास छाप छोड़ी। उनकी उपलब्धियों की सूची काफी लंबी है, लेकिन अभिनेत्री आशा पारेख के करियर को नई पहचान देने वाला उनका योगदान आज भी विशेष रूप से याद किया जाता है।
31 मई, 1925 को जन्में राज खोसला उन चुनिंदा निर्देशकों में थे, जिन्हें कलाकारों की छिपी प्रतिभा पहचानने की अद्भुत क्षमता हासिल थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण आशा पारेख हैं। एक समय ऐसा था जब फिल्म इंडस्ट्री में आशा पारेख को मुख्य रूप से एक ग्लैमरस और डांसिंग स्टार के रूप में देखा जाता था। उनकी लोकप्रियता तो थी, लेकिन उनकी अभिनय क्षमता को लेकर अक्सर सवाल उठाए जाते थे।
यहीं पर राज खोसला ने वह किया, जिसने आशा पारेख की पूरी छवि बदल दी। अभिनेत्री साधना के साथ लगातार सफल फिल्में देने के बाद राज खोसला ने आशा पारेख के साथ भी कई महत्वपूर्ण फिल्में कीं। इनमें सबसे पहली फिल्म थी 'दो बदन', जो वर्ष 1966 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म ने आशा पारेख के करियर को नई दिशा दी।
खुद आशा पारेख ने कई मौकों पर स्वीकार किया कि उस दौर में लोग उन्हें सिर्फ एक ग्लैमरस और डांसिंग स्टार मानते थे। उनके अनुसार, किसी को भी नहीं लगता था कि वह गंभीर और भावनात्मक भूमिकाएं निभा सकती हैं। ऐसे समय में राज खोसला ने उन पर भरोसा जताया और उन्हें 'दो बदन' में एक चुनौतीपूर्ण किरदार दिया।
फिल्म रिलीज होने के बाद न केवल दर्शकों ने उनके अभिनय को सराहा, बल्कि आलोचकों को भी अपनी राय बदलनी पड़ी। आशा पारेख ने कहा था कि इस फिल्म ने उन्हें वह आत्मविश्वास दिया, जिससे उन्हें एहसास हुआ कि वह सिर्फ मनोरंजक भूमिकाएं ही नहीं, बल्कि गंभीर किरदार भी प्रभावशाली ढंग से निभा सकती हैं।
'दो बदन' की सफलता के बाद राज खोसला और आशा पारेख की जोड़ी ने 'चिराग' और बाद में 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' जैसी फिल्मों में भी साथ काम किया। खासकर 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' को हिंदी सिनेमा की यादगार फिल्मों में गिना जाता है। इस फिल्म ने रिश्तों, त्याग और आत्मसम्मान जैसे विषयों को संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारा था।
राज खोसला की यही खासियत उन्हें अपने दौर के अन्य निर्देशकों से अलग बनाती है। उन्होंने कलाकारों को केवल स्टार नहीं माना, बल्कि उनके भीतर मौजूद अभिनेता को पहचानने और निखारने का काम किया। यही वजह है कि उनके साथ काम करने वाले कई कलाकारों के करियर को नई दिशा मिली।
गुरुदत्त के सहायक निर्देशक (असिस्टेंट डायरेक्टर) के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने वाले और देव आनंद के करीबी मित्र राज खोसला ने 'सीआईडी', 'वो कौन थी?', 'मेरा साया', 'दो रास्ते', 'मेरा गांव मेरा देश', 'दोस्ताना' और 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' जैसी फिल्मों के जरिए हिंदी सिनेमा को कई यादगार फिल्में दीं। सस्पेंस फिल्मों के साथ-साथ सामाजिक और पारिवारिक विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ ने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित निर्देशकों में शामिल किया।
--आईएएनएस
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