पुण्यतिथि विशेष: 'चित्रलेखा' से अमर हुए भगवतीचरण वर्मा, वकालत छोड़ी और बन गए हिंदी के कालजयी उपन्यासकार
नई दिल्ली, 4 अक्टूबर (आईएएनएस)। 5 अक्टूबर 1981 को हिंदी साहित्य ने अपने सबसे बड़े कथाकारों में से एक को खो दिया था। भगवतीचरण वर्मा की पुण्यतिथि पर उनके जीवन और साहित्य को याद करना आज भी प्रासंगिक है क्योंकि उन्होंने प्रेमचंद के बाद के उपन्यास को एक नई दिशा दी।
भगवतीचरण वर्मा का जन्म 30 अगस्त 1903 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के शफीपुर (सफीपुर) कस्बे में हुआ था। वे एक बिखरते हुए जमींदार परिवार से थे। पिता देवीचरण वर्मा पेशे से वकील थे लेकिन 1908 में प्लेग महामारी में उनके निधन के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई पर पड़ा।
साहित्य से उनका नाता बचपन से ही जुड़ गया। वे स्कूल की हस्तलिखित पत्रिका के नियमित लेखक बन गए और 'प्रताप' व 'शारदा' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपने लगे। महज 15 साल की उम्र में उन्हें कानपुर के साहित्यिक गुट में जगह मिल गई, जहां विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक', बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जैसे दिग्गजों से उनका संपर्क हुआ। साहित्य में इतने डूबे कि हाईस्कूल और इंटर दोनों दूसरे प्रयास में पास कर सके। बाद में इलाहाबाद जाकर उन्होंने 1926 में हिंदी, अंग्रेजी और इतिहास से स्नातक और फिर एलएलबी की।
1928 में वकालत शुरू की पर मन नहीं लगा। हमीरपुर में वकालत के दौरान भद्री के राजा बजरंग बहादुर सिंह के संपर्क में आए। यहीं उन्होंने अपने सबसे प्रसिद्ध उपन्यास 'चित्रलेखा' पर काम शुरू किया। 'चित्रलेखा' के प्रकाशन और उसकी अपार सफलता ने उनकी किस्मत बदल दी। पाप-पुण्य की दार्शनिक व्याख्या करता यह उपन्यास आज भी हिंदी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जाता है।
इसके बाद वे कलकत्ता फिल्म कॉर्पोरेशन और 'विचार' पत्रिका से जुड़े। केदार शर्मा ने जब 'चित्रलेखा' पर फिल्म बनानी शुरू की तो वे बॉम्बे टॉकीज में सिनेरियो लेखक के तौर पर शामिल हो गए। 1950 तक 'पतन', 'तीन वर्ष' और 'चित्रलेखा' के साथ वे हिंदी के प्रतिष्ठित उपन्यासकार बन चुके थे। आकाशवाणी लखनऊ और दिल्ली से भी उनका लंबा जुड़ाव रहा।
वर्मा ने शुरुआत छायावादी कवि के रूप में की थी, उनकी कविताओं में 'अस्मिता की खोज' और आत्म-दर्शन प्रमुख था। बाद में कहानियों, निबंधों और नाटकों में भी उन्होंने सामाजिक यथार्थ पर हास्य-व्यंग्य के साथ चोट की।
हालांकि उनकी असली पहचान उपन्यासकार के तौर पर है। 'टेढ़े-मेढ़े रास्ते', 'आखिरी दांव', 'अपने खिलौने' और 'भूले-बिसरे चित्र' जैसे बृहद उपन्यासों में उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन, जमींदारी के पतन और बदलते सामाजिक मूल्यों का जीवंत चित्रण किया। 'भूले-बिसरे चित्र' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया और वे राज्यसभा सदस्य के रूप में भी मनोनीत हुए।
--आईएएनएस
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