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प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना से उद्यमी बने सत्यम सुंदरम, बांस के कारोबार से 40 परिवारों को मिला रोजगार

पूर्णिया, 29 अक्टूबर (आईएएनएस)। कोविड महामारी के दौरान नौकरी छूटने, माता-पिता के गंभीर रूप से बीमार होने और परिवार की जमा पूंजी इलाज में खर्च हो जाने के बाद सत्यम सुंदरम के सामने भविष्य को लेकर बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी।
 

पूर्णिया, 29 अक्टूबर (आईएएनएस)। कोविड महामारी के दौरान नौकरी छूटने, माता-पिता के गंभीर रूप से बीमार होने और परिवार की जमा पूंजी इलाज में खर्च हो जाने के बाद सत्यम सुंदरम के सामने भविष्य को लेकर बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी।

एमबीए पास सत्यम की नौकरी एक कंपनी में लगी थी, लेकिन वर्ष 2020 में महामारी ने उनकी जिंदगी बदल दी। उन्होंने ऐसे कठिन समय में रोजगार का रास्ता चुना। उन्होंने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत बैंक से 10 लाख रुपए का लोन लेकर बांस से बने उत्पादों का कारोबार शुरू किया। आज उनकी कंपनी मणिपुरी बैंबू आर्किटेक्चर के माध्यम से करीब 40 परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है।

सत्यम की कहानी केवल एक युवा के उद्यमी बनने की नहीं, बल्कि उनकी मां आशा अनुरागिनि के संघर्ष, भरोसे और बेटे को आगे बढ़ाने के संकल्प की भी है। कभी समाज के ताने सुनने वाली मां आज बेटे की सफलता पर गर्व महसूस करती हैं।

पूर्णिया के रहने वाले सत्यम के पिता चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हैं। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद परिवार ने उन्हें पढ़ाया। सत्यम ने पूर्णिया से शुरुआती शिक्षा प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए पटना तथा कोलकाता गए। उन्होंने बीसीए और फिर एमबीए की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही उनके मन में पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ उत्पादों का व्यवसाय शुरू करने का विचार आया। उन्होंने बांस से बनने वाले सामान, उनके निर्माण की प्रक्रिया और बाजार की संभावनाओं पर अध्ययन किया।

सत्यम ने बताया कि इंटर्नशिप के दौरान उनके प्रदर्शन के आधार पर उन्हें प्री-प्लेसमेंट ऑफर मिला और बाद में कंपनी में नौकरी भी लग गई। लेकिन, कोविड महामारी के दौरान उनके माता-पिता दोनों गंभीर रूप से बीमार हो गए। उन्हें नौकरी छोड़कर पूर्णिया लौटना पड़ा, ताकि माता-पिता की देखभाल और इलाज की जिम्मेदारी संभाल सकें। इसी दौरान उनकी नौकरी भी चली गई। इलाज में परिवार की जमा-पूंजी खर्च हो गई और आर्थिक स्थिति बेहद कठिन हो गई।

सत्यम ने बताया कि एमबीए के दौरान बांस के उत्पादों को लेकर जो विचार आया था, उसे उन्होंने मुश्किल समय में अमल में लाने का फैसला किया। समाचार पत्र के माध्यम से उन्हें प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम की जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने असम और मणिपुर जाकर बांस से बने उत्पादों के बारे में जानकारी जुटाई। शुरुआत में उन्होंने लगभग तीन हजार रुपए के बांस के उत्पाद खरीदे और पूर्णिया में सड़क किनारे स्टॉल लगाकर बेचना शुरू किया। करीब तीन महीने तक उन्होंने लोगों की प्रतिक्रिया जानने और बाजार की मांग समझने के लिए सड़क पर ही सामान बेचा। शुरुआती दिनों में कई चुनौतियां आईं, लेकिन लोगों को पर्यावरण के अनुकूल बांस से बने उत्पाद पसंद आने लगे।

उन्होंने बताया कि शुरुआत में उनके साथ केवल एक कर्मचारी था। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत बैंक से 10 लाख रुपए का लोन मिलने के बाद उन्होंने अपना छोटा उत्पादन केंद्र शुरू किया और धीरे-धीरे कारोबार बढ़ाया। सत्यम ने कहा कि यदि योजना के तहत ऋण नहीं मिलता, तो उनके लिए उस कठिन दौर से निकलकर व्यवसाय शुरू करना बहुत मुश्किल होता।

सत्यम की मां आशा अनुरागिनि ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी। उन्होंने अपने बेटे को कठिनाइयों के बावजूद पढ़ाया और एमबीए तक की शिक्षा दिलाई। कोविड के दौरान नौकरी छूटने के बाद जब सत्यम ने बांस के उत्पादों का कारोबार शुरू करने की बात कही, तो परिवार और समाज में कुछ लोगों ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कुछ लोग ताना मारते थे कि एमबीए कराने के बाद बेटे से बांस का काम करवाया जा रहा है। उनके पति भी शुरुआत में घर की खराब आर्थिक स्थिति के कारण इस काम को लेकर आशंकित थे। लेकिन उन्हें बेटे के विचार पर भरोसा था। प्रकृति से उनका जुड़ाव रहा है और बांस जैसे पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों के कारोबार को उन्होंने इसी वजह से समर्थन दिया।

आशा ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत मिले ऋण का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे बेटे को अपना काम शुरू करने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि आज लोग सत्यम की सफलता के कारण उन्हें सम्मान देते हैं। उन्होंने भावुक होकर कहा कि बेटे की मेहनत ने परिवार का नाम ऊंचा किया है और अब वह गर्व से उसकी उपलब्धियों के बारे में बताती हैं।

सत्यम की फैक्ट्री में काम करने वाले कारीगरों के लिए भी यह कारोबार आजीविका का सहारा बना है। फिलहाल फैक्ट्री में 10 लोग काम करते हैं, जिनमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं। इसके अलावा, कंपनी से जुड़े दूसरे लोग उत्पाद लेकर अलग-अलग स्थानों पर स्टॉल लगाते हैं और बिक्री करते हैं। इस तरह कारोबार से जुड़े परिवारों की कुल संख्या करीब 40 बताई गई है।

कारीगर लवली ने बताया कि वह पहले मधुबनी पेंटिंग और कपड़े से जुड़े छोटे-मोटे काम करती थीं, लेकिन उससे परिवार का गुजारा मुश्किल था। बाद में वह आशा अनुरागिनि और सत्यम की फैक्ट्री से जुड़ीं और बांस के उत्पाद बनाना सीखा। यहां काम मिलने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और अब वह अपने बच्चे को निजी स्कूल में पढ़ा पा रही हैं। रोजगार मिलने से उनका परिवार खुश है।

फैक्ट्री में चार साल से काम कर रहे मुन्ना उरांव ने बताया कि पहले वह टेंट हाउस में मिस्त्री का काम करते थे। शुरुआत में बांस के उत्पाद बनाने का काम सीखने में समय लगा, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इसमें दक्षता हासिल कर ली। अब कई तरह के सामान बनाते हैं। इस काम से उनके परिवार की आजीविका चल रही है और उनके बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।

सत्यम ने बताया कि आज उनके बांस से बने उत्पाद पूर्णिया से निकलकर देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच रहे हैं। पूर्णिया, कटिहार, दानापुर और हाजीपुर सहित विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर उनके स्टॉल हैं। उनके उत्पाद देश के कई राज्यों तक पहुंच चुके हैं और अब विदेशों में भी भेजे जाने लगे हैं। सत्यम ने यह भी बताया कि उनके कारोबार से छोटी पूंजी वाले लोग भी जुड़ रहे हैं। वे उनसे उत्पाद खरीदकर अलग-अलग जगहों पर स्टॉल लगाते हैं और बिक्री के जरिए आमदनी करते हैं। कम पूंजी में अपना छोटा व्यवसाय शुरू करने की इच्छा रखने वाले लोगों को भी इस मॉडल से अवसर मिल रहा है।

सत्यम ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के बारे में कहा कि बैंक से ऋण मिलने से उन्हें केवल आर्थिक सहायता नहीं मिली, बल्कि मुश्किल दौर में आगे बढ़ने का आत्मविश्वास भी मिला। उन्होंने बताया कि आवेदन करने के बाद बैंक से ऋण मिला और उसी पूंजी से उन्होंने कारोबार को आगे बढ़ाया।

--आईएएनएस

पीएसके/एबीएम