पितृपक्ष 2026: यूपी के इन तीर्थ स्थानों पर पिंडदान से मिलती है पितरों को मुक्ति, जानिए मान्यता और महत्व
लखनऊ, 25 सितंबर (आईएएनएस)। 26 सितंबर से शुरू हो रहे पितृपक्ष में पितरों की मुक्ति के लिए पिंडदान का विशेष महत्व है और इसके लिए गया ही नहीं, उत्तर प्रदेश में भी कई पवित्र स्थल हैं। प्रयागराज के त्रिवेणी संगम से लेकर काशी के मणिकर्णिका घाट, मथुरा के ध्रुव घाट और अयोध्या के 'सरयू तट' तक पर पिंडदान से पूर्वजों को मोक्ष मिलने की मान्यता है।
भव्य मंदिरों से सुशोभित कान्हा नगरी मथुरा को भारत और उसके बाहर एक पवित्र स्थान का दर्जा प्राप्त है। ये एक पवित्र तीर्थ शहर है और पिंड दान के लिए पसंदीदा स्थानों में से भी एक है। इस तरह के अनुष्ठान यमुना नदी के तट पर स्थित बोधिनी तीर्थ, विश्रंती तीर्थ और वायु तीर्थ पर किए जाते हैं। सात पिंड या चावल में मिक्स गेहूं के आटे से बने गोले, शहद और दूध के साथ मृतक और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रसाद के रूप में तैयार किए जाते हैं और इन्हें मंत्रों के जाप के दौरान चढ़ाया जाता है।
मथुरा में तर्पण कर लोग अपने पूर्वजों को प्रसन्न करते हैं। मथुरा में यमुना किनारे 24 प्रमुख घाटों में से एक ध्रुव घाट है। इसके पास ध्रुव टीले पर छोटे मंदिर में ध्रुव जी का विग्रह है। इसे पितृ तर्पण के लिए प्रधान माना जाता है।
ब्रजवासियों के साथ-साथ देश के विभिन्न भागों के लोग गया जाने की जगह अपने पितरों के मोक्ष के लिए राधाकुंड में 'गया घाट' पर पिंडदान करते हैं। राधाकुंड वह पावन स्थल है जहां पर राधा और कृष्ण ने स्वयं के स्नान के लिए कुंडों को इस प्रकार प्रकट किया था कि दोनों कुंड अस्तित्व में आने के बाद एक हो जाएं। इन कुंडों के किनारे 19 घाट बने हुए हैं।
अयोध्या में अपने पूर्वजों का पिंडदान करना बहुत पुण्य और मोक्षदायक माना जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम की नगरी अयोध्या में पितरों का तर्पण और श्राद्ध करने से उन्हें शांति और मुक्ति मिलती है। पवित्र सरयू नदी के तट पर भरत कुंड है, जहां लोग हिंदू ब्राह्मण पुजारी की अध्यक्षता में अनुष्ठान करने के अपने दायित्व को पूरा करते हैं। एक प्रथा के रूप में लोग अपने पूर्वजों के लिए यहां हवन भी करवाते हैं। परिवार के सदस्य पहले नदी में डुबकी लगाते हैं और फिर अनुष्ठान के लिए बैठते हैं, जिसके बाद वे गरीबों को भिक्षा देते हैं और फिर घर लौट जाते हैं।
भरत कुंड वह स्थान है जो वनवास से लौटे राम और भरत के मिलन का साक्षी रहा। भगवान विष्णु का बाएं पांव का गयाजी में तो दाहिने पांव का चरण चिह्न भरतकुंड में गयावेदी पर है। वनवास से लौटने पर भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ का तर्पण यहीं किया था। तभी से यहां पिंडदान की परंपरा है। मान्यता है कि भरतकुंड में किया पिंडदान, गया तीर्थ के समान है।
स्कंद पुराण में पितृकार्यों के लिए तीन ही तीर्थ प्रधान माने गए हैं, जिनमें एक बद्रीनाथ, दूसरा बिहार का गया और तीसरा उत्तर प्रदेश का नैमिषारण्य है जो पितरों के तर्पण के लिए विशेष महत्व रखते हैं। पितरों की तृप्ति के लिए नैमिषारण्य तीर्थ को प्रधान माना गया है। नैमिषारण्य तीर्थ में जो व्यक्ति अपने पितरों के नाम से पिंडदान करता है। मान्यता है कि उनके पित्तर बैकुंठधाम जाते हैं।
भगवान शिव की नगरी काशी में गंगा घाट पर श्राद्ध और तर्पण करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। मान्यता है कि यहां मणिकर्णिका घाट या पिशाच मोचन कुंड पर कर्मकांड करने से पितरों को अकाल मृत्यु व अन्य कष्टों से मुक्ति मिलती है। अकाल मृत्यु, दुर्घटना या असाधारण मृत्यु वाले परिजनों की शांति, त्रिपिंडी श्राद्ध और प्रेत योनि से मुक्ति के लिए पिशाच मोचन कुंड पर पिंडदान करवा सकते हैं। इस कुंड को ऐसे दान के लिए खास माना जाता है। महाश्मशान कहे जाने वाले मणिकर्णिका घाट पर सामान्य पिंडदान, तर्पण और मोक्ष प्राप्ति की कामना से जुड़े सभी कार्य किए जाते हैं।
पितरों की मुक्ति का प्रथम और मुख्य द्वार कहे जाने की वजह से प्रयाग में पिंडदान का विशेष महत्व है। प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी संगम पर तर्पण करने से पितर तृप्त होते हैं और उन्हें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। सनातन धर्म के मुताबिक, पितरों के श्राद्ध कर्म की शुरुआत प्रयाग के मुंडन संस्कार से ही शुरू होती है। यहां मुंडन कर अपने बालों का दान करने के बाद 17 पिंडों को तैयार कर उनकी पूजा अर्चना की जाती है और विधि-विधान से उन्हें संगम में विसर्जित कर बाकी के अनुष्ठान करते हैं।
मान्यता है कि संगम पर पिंडदान करने से भगवान विष्णु के साथ ही तीर्थराज प्रयाग में वास करने वाले 33 करोड़ देवी-देवता भी पितरों को मोक्ष प्रदान करते हैं।
--आईएएनएस
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