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पसंद थी महात्मा गांधी की विचारधारा, फिर एक फैसले ने बदल दिया अशफाक उल्ला खां का मन, बन गए क्रांतिकारी

नई दिल्ली, 21 अक्टूबर (आईएएनएस)। एक जंग-ए-आजादी का महानायक, जिसे पसंद था शायरी लिखना, वो देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर गया। ऐसा क्रांतिकारी, जो बना हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल। गुलामी की जंजीरों को तोड़ते हुए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले कई महानायक हुए। ऐसे में जब भी दौर-ए-इंकलाब की बात होगी तो शहीदों की कतार में अशफाक उल्ला खां का नाम भी वतन के सजदे का हकदार होगा।
 

नई दिल्ली, 21 अक्टूबर (आईएएनएस)। एक जंग-ए-आजादी का महानायक, जिसे पसंद था शायरी लिखना, वो देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर गया। ऐसा क्रांतिकारी, जो बना हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल। गुलामी की जंजीरों को तोड़ते हुए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले कई महानायक हुए। ऐसे में जब भी दौर-ए-इंकलाब की बात होगी तो शहीदों की कतार में अशफाक उल्ला खां का नाम भी वतन के सजदे का हकदार होगा।

22 अक्टूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक उल्ला खां पहले उर्दू की शायरी में दिलचस्पी रखा करते थे। उन्हें कविताएं लिखने का काफी शौक था, जिसमें वे अपना उपनाम 'हसरत' लिखा करते थे।

मगर अशफाक उल्ला खां जब पंडित राम प्रसाद बिस्मिल से मिले तो उनकी कलम की स्याही भी लाल होने लगी। वैसे तो उन्हें बचपन से ही देश के लिए कुछ करने का जुनून सवार था और छात्र जीवन के समय में आने के साथ विदेशी दासता खलने लगी थी। किशोरावस्था से जवानी की ओर बढ़ते अशफाक उल्ला खां को समय के साथ अंग्रेजों की बढ़ती क्रूरता अब उन्हें और बैचेन करने लगी थी।

कहा जाता है कि अशफाक शुरुआत में महात्मा गांधी की विचारधारा को भी काफी पसंद करते थे। जब 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया था, तब अशफाक उल्ला खां युवा थे। मगर इस घटना ऐसी हुई, जिसने रुख बदल दिया। यह 'चौरी-चौरा' की घटना थी। महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था। यह लेखों में जिक्र मिलता है कि असहयोग आंदोलन की समाप्ति ने ही अशफाक उल्ला खां को क्रांतिकारी रास्ते पर धकेला था।

उस समय देश में चल रहे आंदोलनों को और भी क्रांतिकारी घटनाओं ने अशफाक उल्ला खां को इस तरह प्रभावित किया कि उनके मन में क्रांतिकारी भाव जगने लगे। 1920 में जब बिस्मिल का शाहजहांपुर आना हुआ तो वह पहली बार था, जो क्रांतिकारी दल चुनने के प्रयास करने वाले अशफाक की उनसे मुलाकात हुई।

फिर 1922 में जब बिस्मिल से असहयोग आंदोलन को लेकर पहली बैठक बुलाई तो अशफाक को भी शामिल होने का अवसर मिला। धीरे-धीरे बिस्मिल के साथ अशफाक का जुड़ाव बढ़ता गया और फिर उन्हें पार्टी 'मातृवेदी' में सदस्यता मिल गई। कहा जाता है कि यहीं से उनकी जिंदगी का नया अध्याय शुरू हुआ और पूर्ण रूप से देश के लिए मर-मिटने वाले क्रांतिकारी बन गए।

1924 में अशफाक उल्ला खान ने अपने जैसे विचारों वाले स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' नाम का एक संगठन बनाया। इस संगठन का उद्देश्य भारत को स्वतंत्र कराने के लिए सशस्त्र क्रांति करना था।

वह 9 अगस्त 1925 का दिन था, जब ऐतिहासिक 'काकोरी कांड' को अंजाम दिया गया था। इसमें अशफाक उल्ला खां की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास काकोरी में ब्रिटिश सरकार का पैसा ले जा रही एक ट्रेन को लूट लिया। उस समय पुलिस ने राम प्रसाद बिस्मिल को पकड़ लिया, लेकिन अशफाक उल्ला खां पुलिस की पकड़ में नहीं आए। हालांकि, 11 महीने बाद दोस्त की दगाबाजी की वजह से उन्हें सलाखों के पीछे डाल दिया गया।

ट्रेन लूट के कुछ महीनों बाद में वे देश से निकलने का रास्ता खोजने के लिए दिल्ली गए थे। उन्होंने अपने एक पठान दोस्त की मदद ली, जो पहले उनका सहपाठी भी रह चुका था लेकिन इस दोस्त ने उनके साथ विश्वासघात किया और पुलिस को उनके ठिकाने के बारे में बता दिया। 17 जुलाई, 1926 की सुबह पुलिस उनके घर पहुंची और उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

काकोरी डकैती कांड के मुकदमे में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और कुछ अन्य लोगों को मौत की सजा सुनाई गई। 19 दिसंबर, 1927 को फैजाबाद जेल में क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खान को फांसी दे दी गई।

--आईएएनएस

डीसीएच/वीसी