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पारसनाथ पहाड़ी पर आदिवासी समाज का दावा तेज, मरांगबुरु के पारंपरिक अधिकारों की बहाली की मांग

गिरिडीह, 5 नवंबर (आईएएनएस)। झारखंड के गिरिडीह जिले में पारसनाथ पहाड़ी को लेकर आदिवासी समाज ने अपने पारंपरिक और धार्मिक अधिकारों की मांग तेज कर दी है। संताल आदिवासी समाज के दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में इस पहाड़ी को ‘मरांगबुरु धोरोमगढ़’ के सर्वोच्च तीर्थस्थल घोषित करते हुए इसके पारंपरिक और धार्मिक अधिकारों की बहाली तथा सुरक्षा का प्रस्ताव पारित किया गया है।
 

गिरिडीह, 5 नवंबर (आईएएनएस)। झारखंड के गिरिडीह जिले में पारसनाथ पहाड़ी को लेकर आदिवासी समाज ने अपने पारंपरिक और धार्मिक अधिकारों की मांग तेज कर दी है। संताल आदिवासी समाज के दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में इस पहाड़ी को ‘मरांगबुरु धोरोमगढ़’ के सर्वोच्च तीर्थस्थल घोषित करते हुए इसके पारंपरिक और धार्मिक अधिकारों की बहाली तथा सुरक्षा का प्रस्ताव पारित किया गया है।

पहाड़ी की तलहटी मधुबन में आयोजित महासम्मेलन में ‘मरांगबुरु बचाओ संघर्ष मोर्चा’ की ओर से आयोजित इस महासम्मेलन में झारखंड के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और छत्तीसगढ़ सहित नेपाल और बांग्लादेश से भी प्रतिनिधियों की भागीदारी रही। गुरुवार को समापन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी पत्नी और गांडेय विधायक कल्पना मुर्मू सोरेन के साथ शामिल हुए।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संथाली और हिंदी में अपने संबोधन में कहा कि मरांगबुरु केवल एक पहाड़ी या स्थल नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आस्था, संस्कृति और ऐतिहासिक पहचान का प्रतीक है। अपनी धरोहर और अधिकारों की रक्षा के लिए समाज को एकजुट रहना होगा।

उन्होंने कहा कि आदिवासियों को संविधान के तहत कई अधिकार प्राप्त हैं और राज्य सरकार उनके अधिकारों, संस्कृति तथा परंपराओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। कल्पना सोरेन ने भी सम्मेलन को संबोधित करते हुए मरांगबुरु की महत्ता को रेखांकित किया। सम्मेलन के आयोजकों और प्रतिनिधियों ने कहा कि मरांगबुरु आदिवासी समाज की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा है। इसके संरक्षण और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए समाज को एकजुट होकर आवाज उठानी होगी।

सम्मेलन में पारित प्रस्ताव में पारसनाथ पहाड़ी को अनादि काल से संताल आदिवासी समाज का पवित्र धार्मिक स्थल और धोरोमगढ़ बताया गया। पहाड़ी पर किसी भी तरह के धार्मिक या सांस्कृतिक अतिक्रमण को रोकने तथा दिशोम मांझीथान सहित पारंपरिक पूजा स्थलों का मूल स्वरूप बनाए रखने की मांग की गई।

प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार से आगामी राष्ट्रीय जनगणना में अलग आदिवासी सरना धर्म कोड शामिल करने और इसे लागू करने की मांग भी की। इसके अलावा संथाली भाषा और ओलचिकी लिपि को शिक्षा तथा रोजगार से जोड़ने, पारंपरिक मांझी-परगना स्वशासन व्यवस्था को मजबूत करने और आदिवासी संस्कृति के दस्तावेजीकरण का प्रस्ताव पारित किया गया। उल्लेखनीय है कि जैन समाज इस पहाड़ी को सम्मेद शिखरजी के रूप में पूजता है।

जैन मान्यता के अनुसार, 24 में से 20 तीर्थंकरों ने इसी पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया था। वहीं, संताल आदिवासी इसे मरांगबुरु के रूप में अपना प्रमुख धार्मिक स्थल मानते हैं। पहाड़ी से जुड़े धार्मिक और पारंपरिक अधिकारों को लेकर दोनों समुदायों की अलग-अलग मान्यताएं और मांगें रही हैं। ऐसे में इस क्षेत्र के धार्मिक स्वरूप और परंपराओं से जुड़े मुद्दे संवेदनशील बने हुए हैं।

--आईएएनएस

एसएनसी/एएसएच