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पंडित राम चतुर मलिक: बिना ऑडिशन मिला आकाशवाणी का टॉप ग्रेड, गायकी का जादू इंग्लैंड-फ्रांस भी पहुंचा

मुंबई, 4 अक्टूबर (आईएएनएस)। सिर्फ 15 साल की उम्र में पहली सार्वजनिक प्रस्तुति देने वाले पंडित राम चतुर मलिक ने आगे चलकर ध्रुपद-धमार गायन में ऐसी पहचान बनाई कि उनकी आवाज दरभंगा के दरबार से निकलकर इंग्लैंड और फ्रांस तक पहुंची। उन्हें आकाशवाणी का 'टॉप ग्रेड' भी बिना ऑडिशन के दिया गया। 5 अक्टूबर 1902 को जन्मे राम चतुर मलिक का पूरा जीवन भारतीय शास्त्रीय संगीत की उस परंपरा से जुड़ा रहा, जिसमें राग, लय और बंदिश को बेहद खास जगह दी जाती है।
 

मुंबई, 4 अक्टूबर (आईएएनएस)। सिर्फ 15 साल की उम्र में पहली सार्वजनिक प्रस्तुति देने वाले पंडित राम चतुर मलिक ने आगे चलकर ध्रुपद-धमार गायन में ऐसी पहचान बनाई कि उनकी आवाज दरभंगा के दरबार से निकलकर इंग्लैंड और फ्रांस तक पहुंची। उन्हें आकाशवाणी का 'टॉप ग्रेड' भी बिना ऑडिशन के दिया गया। 5 अक्टूबर 1902 को जन्मे राम चतुर मलिक का पूरा जीवन भारतीय शास्त्रीय संगीत की उस परंपरा से जुड़ा रहा, जिसमें राग, लय और बंदिश को बेहद खास जगह दी जाती है।

राम चतुर मलिक का जन्म संगीत से जुड़े परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित राजित राम मलिक दरभंगा महाराज के दरबार के जाने-माने संगीतज्ञ थे। वह ध्रुपद गायक होने के साथ संस्कृत के विद्वान और कवि भी थे। घर के इसी माहौल में राम चतुर मलिक ने संगीत की शुरुआती शिक्षा हासिल की। बचपन से ही उनकी प्रतिभा नजर आने लगी थी और महज 15 साल की उम्र में उन्होंने पहली सार्वजनिक संगीत प्रस्तुति दी।

साल 1924 में उनकी जिंदगी में एक बड़ा मोड़ आया, जब दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह ने उन्हें अपने दरबार का राजगायक नियुक्त किया। उस समय दरभंगा दरबार शास्त्रीय संगीत के बड़े केंद्रों में गिना जाता था। राम चतुर मलिक को यहां रहते हुए अपनी गायकी को और निखारने का मौका मिला।

राम चतुर मलिक की गायकी की सबसे बड़ी पहचान उनका ध्रुपद और धमार गायन था। ध्रुपद की चार प्रमुख वाणियों- गौहर, डागर, खंडार और नौहर पर मजबूत पकड़ थी। उनका अंदाज दूसरे ध्रुपद गायकों से काफी अलग था। वह सिर्फ ध्रुपद और धमार तक सीमित नहीं थे, बल्कि ख्याल, ठुमरी और मैथिली लोकगीतों में भी अच्छे थे।

उनकी प्रतिभा को सिर्फ भारत में ही नहीं, विदेशों में भी पहचान मिली। साल 1937 में वह दरभंगा महाराज के छोटे भाई विश्वेश्वर सिंह के साथ इंग्लैंड और फ्रांस गए। वहां उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति दी। उस दौर में किसी भारतीय शास्त्रीय गायक का विदेश जाकर अपनी कला पेश करना अपने आप में बड़ी बात थी।

उनके करियर से जुड़ा एक और दिलचस्प किस्सा आकाशवाणी से जुड़ा है। उन्हें आकाशवाणी का सर्वोच्च 'टॉप ग्रेड' बिना ऑडिशन के ही दिया गया था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि संगीत की दुनिया में उनकी प्रतिष्ठा कितनी मजबूत थी। साल 1976 में फ्रांस सरकार ने उनकी ध्रुपद-धमार की रिकॉर्डिंग को यूनेस्को प्रसारण के लिए भी चुना।

राम चतुर मलिक को उनके योगदान के लिए कई बड़े सम्मान मिले। साल 1964 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जबकि 1974 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री दिया। उन्हें 'ध्रुपद सम्राट' के नाम से भी जाना गया। उनका निधन 1990 में हुआ, लेकिन उनकी रिकॉर्डिंग आज भी ध्रुपद-धमार के श्रोताओं के बीच सुनी जाती हैं।

--आईएएनएस

पीके/वीसी