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पहाड़ों की गोद में बसा मां पूर्णागिरि का दरबार, चैत्र मेले में उमड़ता है भक्तों का सैलाब

उत्तराखंड, 21 मार्च (आईएएनएस)। देवभूमि उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में जहां श्रद्धा का सागर उमड़ता है और हिमालय की ऊंची चोटियों में माता रानी के जयकारों की गूंज सुनाई देती हैं, चंपावत जिले के टनकपुर के पास मां अन्नपूर्णा चोटी पर माता रानी का प्रसिद्ध मां पूर्णागिरि मंदिर है।
 
पहाड़ों की गोद में बसा मां पूर्णागिरि का दरबार, चैत्र मेले में उमड़ता है भक्तों का सैलाब

उत्तराखंड, 21 मार्च (आईएएनएस)। देवभूमि उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में जहां श्रद्धा का सागर उमड़ता है और हिमालय की ऊंची चोटियों में माता रानी के जयकारों की गूंज सुनाई देती हैं, चंपावत जिले के टनकपुर के पास मां अन्नपूर्णा चोटी पर माता रानी का प्रसिद्ध मां पूर्णागिरि मंदिर है।

यह मंदिर न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है बल्कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए शांति और आस्था का अद्भुत अनुभव भी देता है। मान्यता है कि यहां पर आने पर माता रानी भक्तों की सभी मुरादें पूरी करती हैं। मंदिर न सिर्फ धार्मिक महत्व का है बल्कि प्राकृतिक सुंदरता से भी भरा हुआ है। पहाड़ों की गोद में बसा यह धाम आध्यात्मिक शांति और खुशहाली देता है।

हर साल चैत्र मास में यहां बड़ा मेला लगता है। इस मेले में देशभर से लाखों श्रद्धालु मां के दर्शन करने आते हैं। मेले में भक्ति भजन, पूजा-पाठ और उत्साह का माहौल रहता है। शनिवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंदिर के महत्व पर प्रकाश डाला।

मुख्यमंत्री ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक वीडियो पोस्ट किया। इसके साथ उन्होंने लिखा, "टनकपुर (चम्पावत) में स्थित मां पूर्णागिरि मंदिर पवित्र शक्तिपीठों में से एक प्रसिद्ध धाम है। मान्यता है कि यहां माता सती की नाभि गिरी थी, इसलिए यह स्थल असीम शक्ति और आस्था का केंद्र माना जाता है। हर वर्ष चैत्र मास में यहां भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें देशभर से लाखों श्रद्धालु मां के दर्शन और आशीर्वाद के लिए पहुंचते हैं।

उन्होंने लिखा, "पहाड़ों की गोद में बसा यह धाम भक्तों को आध्यात्मिक शांति के साथ अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव भी कराता है। आप भी जब टनकपुर आएं, तो इस पावन धाम के दर्शन अवश्य करें।"

मां पूर्णागिरी धाम में 'झूठा मंदिर' की भी पूजा होती है। इस मंदिर के पीछे एक कहानी भी है। मान्यता है कि किसी सेठ ने पुत्र प्राप्ति के लिए माता रानी के दरबार में सोने का मंदिर चढ़ाने की प्रतिज्ञा की थी। मन्नत पूरी होने के बाद लोभवश उस सेठ ने तांबे में सोने का पानी चढ़ाकर मंदिर बनवाया। जब मजदूर उस मंदिर को धाम की ओर ले जा रहे थे तो विश्राम के बाद वह मंदिर वहां से नहीं उठ सका। तब से इसे झूठे मंदिर के रूप में जाना जाता है और मां पूर्णागिरि के दर्शन के बाद श्रद्धालु इस मंदिर में भी पूजा करते हैं।

--आईएएनएस

एनएस/पीएम