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ऑपरेशन सिंदूर: भारत के नागास्त्र ड्रोन ने आतंकी ठिकानों पर किया था सटीक प्रहार

नई दिल्ली, 18 जनवरी (आईएएनएस)। 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भारतीय सोलर ग्रुप द्वारा निर्मित नागास्त्र ड्रोन का सफलतापूर्वक उपयोग किया गया था। इस ड्रोन ने देश की ओर बुरी नजर रखने वाले आतंकियों के ठिकानों पर सटीक प्रहार कर अपनी रणनीतिक क्षमता को सिद्ध किया। यह जानकारी रविवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दी।
 
ऑपरेशन सिंदूर: भारत के नागास्त्र ड्रोन ने आतंकी ठिकानों पर किया था सटीक प्रहार

नई दिल्ली, 18 जनवरी (आईएएनएस)। 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भारतीय सोलर ग्रुप द्वारा निर्मित नागास्त्र ड्रोन का सफलतापूर्वक उपयोग किया गया था। इस ड्रोन ने देश की ओर बुरी नजर रखने वाले आतंकियों के ठिकानों पर सटीक प्रहार कर अपनी रणनीतिक क्षमता को सिद्ध किया। यह जानकारी रविवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दी।

राजनाथ सिंह ने बताया कि नागास्त्र के और भी अधिक आधुनिक वर्जन अब विकसित किए जा चुके हैं। भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर ये हथियार शत्रुओं के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होंगे। रक्षा मंत्री ने कहा कि भारतीय पिनाका मिसाइलों का निर्यात भी शुरू हो चुका है। कई देशों ने इसे खरीदने में रुचि दिखाई है। इस तरह की उपलब्धियां न केवल हमारे रक्षा उद्योग की क्षमता को दर्शाती हैं, बल्कि भारत की निर्यात क्षमता को भी और अधिक सशक्त बनाती हैं।

उन्होंने कहा कि अगले कुछ महीनों में ही, इसके सभी परीक्षण पूरे हो जाने के बाद, हमारी सेना इसे देश की रक्षा के लिए एक मजबूत और भरोसेमंद सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल कर सकेगी। वह नागपुर स्थित सोलर इंडस्ट्रीज के मीडियम कैलिबर एम्युनेशन फैसिलिटी के उद्घाटन कार्यक्रम में बोल रहे थे।

यहां रक्षामंत्री ने कहा, “आत्मनिर्भरता, हमारे लिए कितनी महत्त्वपूर्ण है, इसको लेकर भी मुझे, ऑपरेशन सिंदूर का उदहारण याद आ रहा है। लगभग 88 घंटे तक ऑपरेशन सिंदूर चला था, लेकिन वह 88 घंटे अपने आप में कितने विस्तृत और कितने गहन थे, यह शब्दों में बताना मुश्किल है। ऐसे ऑपरेशन में हर मिनट, हर फैसला और हर संसाधन का महत्व होता है। और जब ऑपरेशन इतने गहन होते हैं, तो यह मान लेना स्वाभाविक है कि उनकी तैयारी भी उतनी ही व्यापक, उतनी ही गंभीर और उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। पिछले दस वर्षों में हमने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में, जो मेहनत की, उसका परिणाम यह है कि हमारा घरेलू रक्षा उत्पाद, जो 2014 में जहां मात्र 46,425 करोड़ रुपए था, वहीं आज यह बढ़कर रिकॉर्ड 1.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है। बड़ी बात यह है कि इसमें से 33,000 करोड़ रुपए से अधिक का योगदान प्राइवेट सेक्टर से आना, यह दर्शाता है कि आत्मनिर्भर भारत के इस अभियान में निजी उद्योग भी भागीदार बन रहे हैं। प्राइवेट सेक्टर की बढ़ती भागीदारी का ही परिणाम है, कि भारत का रक्षा निर्यात, जो दस वर्ष पहले 1,000 करोड़ रुपए से भी कम था, आज वह बढ़कर रिकॉर्ड 24,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है।”

रक्षा मंत्री ने कहा कि उन्हें अच्छी तरह से याद है कि वर्ष 2021 में प्राइवेट सेक्टर द्वारा बनाया गया मल्टीमॉडल हैंड ग्रेनेड का पहला पूरा लॉट, जो पूरी तरह से भारत में निर्मित आयुध था, स्वयं उन्होंने आर्मी चीफ को सेना के उपयोग के लिए सौंपा था। यह उस समय रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। एक समय था कि रक्षा उत्पादन लगभग पूरा का पूरा पब्लिक सेक्टर तक सीमित था। प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी बहुत सीमित थी। धीरे-धीरे इस सोच को बदलने का प्रयास किया गया। सिस्टम को ओपन किया, नीतियों में बदलाव किए, प्रक्रियाओं को सरल बनाने की कोशिश की।

रक्षा मंत्री ने कहा, “अब युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रह गए हैं। उनका असर सीधे या परोक्ष रूप से आम जनता तक पहुंचता है। ऊर्जा, ट्रेड, टेरिफ, सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी और इंफारमेशन जैसे क्षेत्र भी अब संघर्ष के नए आयाम बन चुके हैं, जिनके बारे में पहले शायद कल्पना भी नहीं की गई थी, लेकिन इतने बदलावों के बावजूद मैं बहुत सावधानी और पूरे विश्वास के साथ यह कहना चाहूंगा कि हमारी सीमाओं की मुस्तैदी, हमारे हथियार, हमारा हार्डवेयर और हमारा डिफेंस इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरिंग बेस का महत्व किसी भी तरह से कम नहीं हुआ है बल्कि कई मायनों में और बढ़ा है।”

रक्षा मंत्री ने बताया कि सरकार का ध्यान सिर्फ इस बात पर नहीं है कि रक्षा के क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर का योगदान बढ़ना चाहिए, बल्कि इस बात पर भी है कि आने वाले समय में रक्षा निर्माण से जुड़े क्षेत्रों में प्राइवेट सेक्टर की भूमिका 50 प्रतिशत या उससे भी ज्यादा हो। जो चीजें हम नहीं बना सकते, उनके लिए भी कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का प्रावधान तो किया ही गया है। इन्हीं प्रयासों के फलस्वरूप हम कई क्षेत्रों में अपनी स्वदेशी सामग्री बढ़ाने में सफल हुए हैं।

--आईएएनएस

जीसीबी/डीकेपी