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ओ वुमनिया, आ-हा वुमनिया... जब स्नेहा खानवलकर ने तोड़ी सिनेमाई संगीत की बेड़ियां

नई दिल्ली, 27 अप्रैल (आईएएनएस)। 'ओ वुमनिया, आ-हा वुमनिया...' सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के संगीत को एक नई और अलग दिशा देने वाली धुन है जो आज भी लोगों की प्लेलिस्ट का हिस्सा बना हुआ है।
 
ओ वुमनिया, आ-हा वुमनिया... जब स्नेहा खानवलकर ने तोड़ी सिनेमाई संगीत की बेड़ियां

नई दिल्ली, 27 अप्रैल (आईएएनएस)। 'ओ वुमनिया, आ-हा वुमनिया...' सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के संगीत को एक नई और अलग दिशा देने वाली धुन है जो आज भी लोगों की प्लेलिस्ट का हिस्सा बना हुआ है।

गैंग्स ऑफ वासेपुर के इस सुपरहिट गाने को आवाज देने के लिए निर्देशक स्नेहा खानवलकर खुद पटना की भीड़ भरी गलियों में भटकी थी, जहां वे रेखा झा से मिलीं, जिन्होंने इस गाने में जान डाल दी। सिर्फ यही नहीं, स्नेहा ने 'ओए लकी! लकी ओए', 'हन्टर' और 'तू राजा की राजदुलारी' जैसे कई बेहतरीन गीत दिए।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री लंबे समय तक पुरुष प्रधान रही है, खासकर म्यूजिक डायरेक्शन जैसे क्षेत्र। ऐसे में स्नेहा का आना किसी छोटे बदलाव जैसा नहीं था, बल्कि ये एक झटका था। दिलचस्प बात ये है कि वे खुद इस अकेली लड़की वाले टैग को ज्यादा तवज्जो नहीं देतीं। उनके लिए बात सीधी है या तो आपका काम बोलता है या नहीं। और उनका काम इतनी जोर से बोलता है कि आज वह भारत के नामी म्यूजिक डायरेक्टर्स में शुमार हैं।

स्नेहा का जन्म 28 अप्रैल 1983 को हुआ और उनका बचपन इंदौर में बीता। उनका परिवार ग्वालियर घराने से जुड़ा रहा, इसलिए संगीत उनके लिए कोई नई चीज नहीं थी ये उनके माहौल का हिस्सा था। लेकिन उन्होंने इस विरासत को सीधे-सीधे नहीं अपनाया। वे उससे निकलीं, उसे तोड़ा और फिर अपने तरीके से जोड़ा। यही वजह है कि उनके संगीत में शास्त्रीय जड़ों के साथ-साथ देसी लोक और ग्लोबल साउंड का अनोखा मेल दिखता है।

मुंबई आना उनके लिए एक टर्निंग पॉइंट था। परिवार चाहता था कि वे इंजीनियरिंग करें, लेकिन स्नेहा का रास्ता कुछ और ही था। उन्होंने एनीमेशन और आर्ट डायरेक्शन में हाथ आजमाया, लेकिन आखिरकार संगीत ने उन्हें वापस बुला लिया। शुरुआत आसान नहीं थी। छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स, स्ट्रगल और खुद को साबित करने की जद्दोजहद सब कुछ उनके जीवन का हिस्सा रहा। पहली पहचान उन्हें फिल्म 'गो' से मिली, जिसे राम गोपाल वर्मा ने प्रोड्यूस किया था। इसके बाद 'सरकार राज' में एक गाना करने का मौका मिला और यहीं से इंडस्ट्री ने नोटिस लेना शुरू किया।

स्नेहा का असली धमाका तब हुआ जब उन्होंने ओए लकी! लकी ओए! के लिए संगीत दिया। हरियाणा के लोक संगीत से प्रेरित ये साउंडट्रैक इतना अलग था कि लोगों को रुककर सुनना पड़ा।

लेकिन असली क्रांति आई गैंग्स ऑफ वासेपुर के साथ, जिसे अनुराग कश्यप ने बनाया। इस फिल्म के लिए स्नेहा ने सिर्फ कंपोज नहीं किया, उन्होंने खोज की। बिहार की गलियों से लेकर कैरेबियन के द्वीपों तक घूमकर उन्होंने ध्वनियां इकट्ठा कीं। 'ओ वुमनिया', 'हंटर' और 'इलेक्ट्रिक पिया' जैसे गाने सिर्फ ट्रैक नहीं हैं, ये कहानियां हैं। खासकर 'ओ वुमनिया' ने जिस तरह औरतों की आवाज को सामने रखा, वह हिंदी सिनेमा में कम ही देखने को मिलता है।

स्नेहा खानवलकर का संगीत साफ-सुथरा या पॉलिश नहीं होता, बल्कि कच्चा, असली और जिंदा होता है। वे स्टूडियो के महंगे कंसोल्स से ज्यादा भरोसा लोगों की आवाज, उनके माहौल और उनकी कहानियों पर करती हैं। यही वजह है कि उनका हर गाना एक जगह, एक संस्कृति और एक एहसास को साथ लेकर आता है।

--आईएएनएस

पीआईएम/एएस