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नीतीश के राज्यसभा जाने का फैसला उनका नहीं बल्कि दिल्ली से आया : मनोज झा

नई दिल्ली, 5 मार्च (आईएएनएस)। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने पर सियासत गर्मा गई है। आरजेडी सांसद मनोज झा ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि ये फैसला बिहार से नहीं दिल्ली से लिया जा रहा है।
 
नीतीश के राज्यसभा जाने का फैसला उनका नहीं बल्कि दिल्ली से आया : मनोज झा

नई दिल्ली, 5 मार्च (आईएएनएस)। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने पर सियासत गर्मा गई है। आरजेडी सांसद मनोज झा ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि ये फैसला बिहार से नहीं दिल्ली से लिया जा रहा है।

आरजेडी सांसद मनोज कुमार झा ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से कहा, पिछले 20 साल से से वे मुख्यमंत्री हैं और अब देखिए कि उनसे क्या-क्या कहलवाया जा रहा है। मैंने पहले भी बताया था कि जब हमारी बात हुई थी, तब यह सब अंदाजे के दायरे में था। अब मैं कह रहा हूं कि एक ऑपरेशन हुआ है और यह महाराष्ट्र में जो हुआ उसका एक तात्कालिक संस्करण है। वहां, एकनाथ शिंदे को डिमोट कर दिया गया था लेकिन उसी सेटअप में रखा गया।"

उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर किए गए पोस्ट पर कहा, "तमाम बातें अपनी जगह, ये नीतीश कुमार की भाषा नहीं है। विरोध और समर्थन दोनों में हम उनके साथ रहे हैं। ये सोशल मीडिया पोस्ट दिल्ली में लिखा गया है। कितना बचकाना लगता है ये सुनना भी। ये कोई बात हुई? सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि मैं राज्यसभा जाना चाहता हूं। इसकी गूंज कई वर्षों तक रहेगी। बिहार की धरती पर इस तरह के प्रयोग महाराष्ट्र की तरह सफल हो जाएंगे, इसमें मुझे संदेह है।"

मनोज झा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट करते हुए लिखा कि यह मान लेने में शायद ही किसी को संशय हो कि यह पोस्ट नीतीश कुमार की अपनी आवाज नहीं लगती। शब्दों में एक अजीब-सी पराई गूंज है, जैसे वाक्य कहीं और रचे गए हों और यहां केवल उनका पाठ किया गया हो।

उन्होंने कहा कि इसमें तो साफ-साफ दिल्ली दरबार की कलम की आहट सुनाई देती है। लगता है जैसे विचार देश की राजधानी के किसी शांत, सुव्यवस्थित कक्ष में लिखे गए हों, फिर उन्हें किसी ‘अदृश्य दूत’ ने पटना पहुंचा दिया हो और अंततः किसी नियुक्त ‘संरक्षक’ ने समय देखकर उन्हें पोस्ट कर दिया हो।

राजनीति के इस नए व्याकरण में अब शब्द भी प्रवासी हो गए हैं। विचार कहीं जन्म लेते हैं, स्वर कहीं और दिया जाता है और अंततः उनका श्रेय उस नाम को मिलता है जिसकी मुहर सबसे सुविधाजनक होती है। इसीलिए कभी-कभी इस तरह के पोस्ट को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि हम किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति नहीं बल्कि ऊपर के सत्ता के गलियारों में लिखी गई पंक्तियों का सार्वजनिक पाठ सुन रहे हैं। बहरहाल, जय हिन्द, जय बिहार।

--आईएएनएस

एसएके/पीयूष