नवरात्र स्पेशल : रहषु भगत के दर्शन के बिना मां थावे वाली की पूजा मानी जाती है अधूरी, राजा मनन की जिद ने कर दिया था साम्राज्य का विनाश
नई दिल्ली, 11 अक्टूबर (आईएएनएस)। शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व की शुरुआत हो चुकी है। भारत में मां दुर्गा के कई सारे मंदिर है, जिनका अलग-अलग महत्व है। इन्हीं मंदिरों में से एक बिहार का थावे भवानी मंदिर भी है। बिहार के थावे में मां थावेवाली के दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं।
बिहार के गोपालगंज जिले में स्थित 'थावे भवानी मंदिर' को लेकर एक एक बेहद रहस्यमयी कहानी जुड़ी है। गोपालगंज शहर से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर कोई साधारण मंदिर नहीं बल्कि इसे एक 'जाग्रत शक्तिपीठ' माना जाता है।
यह वह स्थान है जहां एक भक्त की सच्ची पुकार और एक राजा के अहंकार की जिद ने इतिहास के पन्नों में एक ऐसा अध्याय लिख दिया, जो आज भी लोगों के रोंगटे खड़े कर देता है।
लोककथाओं के अनुसार, आज से करीब 400 साल पहले इस क्षेत्र में चेरो वंश के राजा मनन सिंह (मनन सेन) का शासन था। राजा मनन सिंह खुद को मां दुर्गा का सबसे बड़ा और परम भक्त मानता था। उसे अपनी भक्ति पर इतना गर्व था कि वह अपने राज्य में किसी और को देवी का भक्त मानने को तैयार ही नहीं था।
उसी दौरान, राज्य में एक भयानक अकाल पड़ा। धरती सूख गई और लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए। इसी राज्य के थावे जंगल में देवी मां का एक परम भक्त 'रहषु भगत' रहा करता था। वह एक साधारण और गरीब इंसान था लेकिन उसकी भक्ति में अपार शक्ति थी।
जनश्रुतियों के अनुसार, अकाल के उस भीषण दौर में रहषु भगत ने देवी मां की आराधना की। मां की कृपा से वह दिन में बाघों के गले में सांप की रस्सी बांधकर जंगली घास (पटेर) की दवरी (दौनी) करता था और रात में उसी घास से चमत्कारिक रूप से अन्न (चावल) निकलने लगता था। रहषु वह सारा अन्न जनता में बांट देता था, जिससे लोगों की जान बचने लगी थी।
जब रहषु भगत के इस चमत्कार की खबर राजमहल तक पहुंची, तो राजा मनन सिंह का अहंकार जाग उठा। उसे यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि कोई साधारण सा इंसान उससे बड़ा भक्त कैसे हो सकता है। राजा ने रहषु भगत को दरबार में बुलवाया। राजा ने रहषु को ढोंगी करार देते हुए आदेश दिया कि यदि वह सच में भक्त है, तो अपनी मां को साक्षात राजमहल में बुलाकर दिखाए।
रहषु भगत ने राजा को हाथ जोड़कर बहुत मिन्नतें कीं। उसने समझाया कि मां दुर्गा को इस तरह हठ से बुलाना विनाश को आमंत्रण देना है। उसने राजा को चेतावनी दी कि यदि मां साक्षात यहां प्रकट हुईं, तो धरती फट जाएगी और पूरा साम्राज्य तबाह हो जाएगा लेकिन राजा अपने घमंड में अंधा था। उन्होंने रहषु की एक न सुनी और उसे सजा देने की धमकी दी।
हार मानकर, भक्त रहषु ने वहीं बैठकर देवी का ध्यान लगाना शुरू किया। लोक मान्यताओं के अनुसार, भक्त की पुकार सुनकर देवी मां असम के कामाख्या से चलीं। कहा जाता है कि कामाख्या से थावे आने के दौरान मां भवानी कई जगहों पर रुकी थीं। वह कोलकाता में दक्षिणेश्वर में काली मां के रूप में, पटना में मां पटन देवी के रूप में और सारण-छपरा के आमी में अंबिका स्थान के रूप में रुकी थीं।
जैसे-जैसे मां करीब आती गईं, रहषु राजा को चेतावनी देता रहा और राजा ने तब भी अपनी जिद नहीं छोड़ी। जब देवी मां थावे पहुंचीं, तो प्रकृति का प्रकोप टूट पड़ा। देखते ही देखते राजा के महल और भवन ढहने लगे। तभी एक भयानक गर्जना हुई और भक्त रहषु भगत का मस्तक बीच से फट गया। उसी फटे हुए मस्तक से देवी मां का एक हाथ बाहर निकला, जिसकी कलाई में दिव्य और अलौकिक 'कंगन' चमक रहा था।
राजा की उसी समय मृत्यु हो गई और रहषु भगत को उसी क्षण मोक्ष की प्राप्ति हो गई और देवी मां उसी स्थान पर (थावे के जंगलों में) हमेशा के लिए स्थापित हो गईं। आज भी थावे में मनन सिंह के महल के खंडहर मौजूद हैं।
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां आने वाले श्रद्धालु मां भवानी के दर्शन करने से पहले, थोड़ी ही दूरी पर स्थित उनके परम भक्त रहषु भगत के मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं। मान्यता है कि रहषु भगत की पूजा के बिना मां थावे वाली की पूजा अधूरी मानी जाती है।
आज देश-विदेश (विशेषकर नेपाल, यूपी और बंगाल) से लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां आते हैं। शारदीय और चैत्र नवरात्रि में यहां भव्य मेला लगता है और माता को विशेष रूप से 'पिड़किया' (पेडुकिया) का प्रसाद चढ़ाया जाता है।
--आईएएनएस
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