नवरात्र का छठा दिन: मां कात्यायनी की पूजा से मिलती है शक्ति, साहस और मनोकामनाओं की पूर्ति
नोएडा, 24 मार्च (आईएएनएस)। चैत्र नवरात्र के छठे दिन (षष्ठी) मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां कात्यायनी को साहस, शक्ति और विजय की देवी माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से भक्त अपने शत्रुओं पर विजय, जीवन में सुख-समृद्धि और बाधाओं से मुक्ति की कामना करते हैं।
वहीं, अविवाहित कन्याएं योग्य वर की प्राप्ति के लिए मां कात्यायनी की पूजा करती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी दुर्गा ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था, इसी कारण उनका नाम कात्यायनी पड़ा।
मां कात्यायनी को महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है, जिन्होंने असुरों का संहार कर धर्म की रक्षा की थी। मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और दिव्य माना जाता है। वे सिंह पर सवार होती हैं और उनकी चार भुजाएं होती हैं। एक हाथ में तलवार और दूसरे में कमल का फूल होता है, जबकि अन्य दो हाथ अभय और वरद मुद्रा में होते हैं। उनका यह स्वरूप शक्ति और करुणा दोनों का प्रतीक है। इस दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और पूजा स्थल को पवित्र किया जाता है।
मां कात्यायनी को पीले या लाल रंग के फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है, क्योंकि उन्हें पीला रंग विशेष प्रिय है। पूजा के दौरान “ॐ देवी कात्यायन्यै नमः” मंत्र का जाप किया जाता है, जिससे मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। मां को शहद का भोग लगाना अत्यंत फलदायी माना गया है। इसके साथ ही शहद से बनी मिठाइयों का भी प्रसाद चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि इससे जीवन में मधुरता आती है और संबंधों में प्रेम बढ़ता है।
मां कात्यायनी की पूजा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आत्मबल, साहस और आत्मविश्वास को भी बढ़ाती है। नवरात्र के इस दिन का संदेश है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और विश्वास बनाए रखना चाहिए। इस प्रकार नवरात्रि का छठा दिन श्रद्धा, भक्ति और शक्ति के संगम का प्रतीक है, जो हर भक्त के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संदेश देता है।
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