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नौतपा: ज्योतिष गणना से लेकर किसानों की फसल के लिए अच्छा संकेत, जानें कब से होंगे शुरू

नई दिल्ली, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। गर्मियों के मौसम की शुरुआत के साथ ही नौतपा का जिक्र होना लाजमी है क्योंकि नौतपा सिर्फ नौ दिन ही नहीं बल्कि वर्षा ऋतु को भी निर्धारित करता है।
 
नौतपा: ज्योतिष गणना से लेकर किसानों की फसल के लिए अच्छा संकेत, जानें कब से होंगे शुरू

नई दिल्ली, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। गर्मियों के मौसम की शुरुआत के साथ ही नौतपा का जिक्र होना लाजमी है क्योंकि नौतपा सिर्फ नौ दिन ही नहीं बल्कि वर्षा ऋतु को भी निर्धारित करता है।

भले ही लोग गर्मी के प्रकोप से बचने के लिए नौतपा के सामान्य रूप से गुजरने की प्रार्थना करते हैं, लेकिन उसका सीधा प्रभाव हमारे किसानों की फसलों और मानसून पर पड़ता है। नौतपा के दिन जितने गर्म और शुष्क होते हैं, उतना ही अच्छा और लंबा मानसून दस्तक देता है। तो चलिए ज्योतिषीय गणना और वैज्ञानिक आधार पर जानते हैं कि नौतपा क्या है और क्यों जरूरी है।

'नौतपा' का अर्थ है नौ दिनों की भारी तपन। इस बार नौतपा 25 मई से शुरू होकर 2 जून तक रहेगा, और यही समय निर्धारित करेगा कि मानसून कैसा होगा। इन नौ दिनों में भयंकर गर्मी पड़ती है और गर्म लू लोगों के जीवन को प्रभावित करती है। ज्योतिष गणना की मानें तो नौतपा में ज्येष्ठ माह में नौतपा के पहले दिन सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं और उनका 10 से लेकर 20 फीसदी तक का अंश रहेगा। वहीं, रोहिणी नक्षत्र के अधिपति चंद्रमा हैं, और सूर्य की उपस्थिति में उनकी शीतलता कम हो जाती है और गर्मी का प्रभाव अधिक बढ़ जाता है।

यही कारण है कि चंद्रमा के कमजोर होने पर नौतपा में पक्षियों के लिए जल रखने की परंपरा चली आई है। यह चंद्रमा को मजबूत करने में मदद करती है।

'नौतपा' का संबंध वर्षा ऋतु से भी है। माना जाता है कि 9 दिन जितनी अधिक गर्मी पड़ती है, मानसून उतना अच्छा होता है। तपिश बढ़ने से समंदर की गर्मी बादलों को वर्षा के लिए तैयार करने में मदद करती है। ऐसे समय में खरीफ की फसलों को अच्छा पानी मिल जाता है, जो फसल को पकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इन फसलों को पकने के लिए नमी और गर्म तापमान दोनों की जरूरत होती है।

बीते कुछ सालों से नौतपा के समय कम गर्मी पड़ी है, जैसे साल 2025 में नौतपा के समय उतनी तपिश नहीं थी, जितनी होनी चाहिए थी; इसका सीधा प्रभाव सीधा मानसून पर देखने को मिला था। बीते साल मानसून कमजोर था और फसलों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पाया था, और कई राज्यों में सूखे का सामना भी करना पड़ा था।

--आईएएनएस

पीएस/पीएम