नालंदा से विकसित भारत के लिए ज्ञान सृजन का आह्वान, राज्यपाल बोले- परंपरा को आधुनिक विज्ञान से जोड़ना जरूरी
राजगीर, 21 सितंबर (आईएएनएस)। बिहार के राज्यपाल सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने सोमवार को नालंदा विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का उद्घाटन करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा को विकसित भारत के निर्माण से जोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत को केवल ज्ञान का उपभोक्ता नहीं, बल्कि ज्ञान का सृजक बनने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सहयोग से आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद का विषय 'विकसित भारत के निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका' है।
इसमें देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों के कुलपति, निदेशक, शिक्षाविद, शोधकर्ता तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं। राज्यपाल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और विकसित भारत पर चर्चा के लिए नालंदा से अधिक उपयुक्त स्थान नहीं हो सकता। उन्होंने नालंदा, राजगीर, बोधगया, वैशाली और विक्रमशिला को ज्ञान, आध्यात्मिकता और बौद्धिक आदान-प्रदान की व्यापक सभ्य्यगत परंपरा का हिस्सा बताया।
उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास, प्रौद्योगिकी और राष्ट्रीय शक्ति के पीछे ज्ञान की केंद्रीय भूमिका है। भारतीय ज्ञान परंपरा का केवल पुनर्स्मरण पर्याप्त नहीं है, बल्कि उससे समकालीन प्रश्न पूछने और आधुनिक विज्ञान के साथ गंभीर संवाद स्थापित करने की आवश्यकता है। उन्होंने गणित, खगोल, चिकित्सा, दर्शन, भाषाविज्ञान, धातुविज्ञान और शासन जैसे क्षेत्रों में भारतीय ज्ञान परंपरा के योगदान का भी उल्लेख किया। राज्यपाल ने भारतीय भाषाओं को शोध, नवाचार और ज्ञान-सृजन की भाषाओं के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने 'नालंदा दृष्टिकोण' की चर्चा करते हुए कहा कि भारत की सभ्यतागत शक्ति ज्ञान, संस्कृति, शिक्षा, विद्वत्ता और बौद्धिक आदान-प्रदान के जरिए वैश्विक साझेदारियां बनाने में भी निहित है। नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि आज सवाल केवल यह नहीं है कि भारतीय ज्ञान परंपरा की आवश्यकता है या नहीं, बल्कि यह है कि इसे आगे कैसे ले जाया जाए।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को दक्षिण एशिया और व्यापक एशियाई सभ्यतागत विरासत से जुड़ी साझा ज्ञान-परंपरा के रूप में देखने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि नालंदा में विभिन्न देशों से आए विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा और नालंदा की ज्ञान-दृष्टि से परिचित कराने के लिए विशेष पाठ्यक्रमों और पहलों पर काम किया जा रहा है।
उन्होंने शास्त्रार्थ की नालंदा परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य बहस में जीत-हार नहीं, बल्कि संवाद के माध्यम से सामूहिक रूप से ज्ञान का विस्तार करना है। प्रख्यात शिक्षाविद् प्रोफेसर रमेश भारद्वाज ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को भारत-केंद्रित बनाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को रेखांकित किया।
वहीं, यूजीसी के पूर्व उपाध्यक्ष प्रोफेसर भूषण पटवर्धन ने भारतीय ज्ञान को केवल विरासत के रूप में देखने के बजाय समकालीन चुनौतियों और नवाचार के स्रोत के रूप में समझने की आवश्यकता बताई। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य और सतत जीवन पद्धति जैसी वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता पर जोर दिया।
दो दिवसीय परिसंवाद में भारतीय ज्ञान परंपरा और नालंदा-बोध, उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेशन, विकसित भारत का सांस्कृतिक आधार और आगामी कार्ययोजना जैसे विषयों पर सत्र और परिचर्चाएं होंगी। परिसंवाद का समापन 22 सितंबर को विमर्श के निष्कर्षों और आगामी कार्ययोजना के साथ होगा।
--आईएएनएस
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