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मुंबई अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव : माइक्रो ड्रामा कहानी कहने की एक विकसित शैली, सिनेमा का 'फास्ट फैशन' नहीं

मुंबई, 16 जून (आईएएनएस)। 19वें मुंबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (एमआईएफएफ) में 'फास्ट फिल्म: क्या माइक्रो ड्रामा सिनेमा का फास्ट फैशन है?' विषय पर एक पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। अभिनेत्री शीना चौहान द्वारा संचालित इस सत्र में फिल्म निर्माता समीर मोदी, अभिनेत्री अर्चना कवि, अभिनेता उज्जवल कुमार और फिल्म निर्माता राफेल स्टेम्पलेव्स्की ने माइक्रो ड्रामा के उदय और समकालीन कहानी कहने की कला पर इसके बढ़ते प्रभाव का विश्लेषण किया।
 
मुंबई अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव : माइक्रो ड्रामा कहानी कहने की एक विकसित शैली, सिनेमा का 'फास्ट फैशन' नहीं

मुंबई, 16 जून (आईएएनएस)। 19वें मुंबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (एमआईएफएफ) में 'फास्ट फिल्म: क्या माइक्रो ड्रामा सिनेमा का फास्ट फैशन है?' विषय पर एक पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। अभिनेत्री शीना चौहान द्वारा संचालित इस सत्र में फिल्म निर्माता समीर मोदी, अभिनेत्री अर्चना कवि, अभिनेता उज्जवल कुमार और फिल्म निर्माता राफेल स्टेम्पलेव्स्की ने माइक्रो ड्रामा के उदय और समकालीन कहानी कहने की कला पर इसके बढ़ते प्रभाव का विश्लेषण किया।

प्रतिभागियों और दर्शकों का स्वागत करते हुए एमआईएफएफ महोत्सव के निदेशक प्रकाश मगदुम ने वक्ताओं को सम्मानित किया और तेजी से विकसित हो रहे मीडिया परिदृश्य में उभरते हुए कहानी कहने के प्रारूपों को समझने के महत्व पर प्रकाश डाला।

पैनल में शामिल सभी प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति जताई कि माइक्रो ड्रामा दर्शकों की बदलती आदतों और मोबाइल उपकरणों के बढ़ते उपयोग से प्रेरित कहानी कहने की कला का एक स्वाभाविक विकास है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भले ही यह प्रारूप छोटा हो, लेकिन इसमें पारंपरिक सिनेमा के समान ही रचनात्मक कौशल और भावनात्मक गहराई की आवश्यकता होती है।

फिल्म निर्माता समीर मोदी ने माइक्रो ड्रामा के बढ़ते चलन पर कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान इस प्रारूप को अत्‍यधिक गति मिली, जब रचनाकारों ने मोबाइल स्क्रीन पर कंटेंट के बढ़ते उपयोग पर गौर किया। उन्होंने माइक्रो ड्रामा को कहानी कहने की एक ऐसी शैली बताया, जिसमें सटीकता और रचनात्मकता की आवश्यकता होती है, जहां सशक्त लेखन, प्रभावशाली अभिनय और सटीक संपादन को सीमित समय में एक साथ लाना होता है।

उन्होंने इस बात पर बल दिया कि माइक्रो ड्रामा को सिनेमा का निम्न स्तर या केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे अपने आप में एक विशिष्ट और विकसित होती कहानी कहने की शैली के रूप में देखा जाना चाहिए।

अभिनेत्री अर्चना कवि ने कहा कि हर प्रौद्योगिकीय बदलाव ने कंटेंट निर्माण के नए स्वरूपों को जन्म दिया है, चाहे वो टेलीविजन हो या डिजिटल प्लेटफॉर्म। माइक्रो ड्रामा में सबसे बड़ी चुनौती दर्शकों का ध्यान शुरुआती कुछ सेकंड में ही आकर्षित करना है। यह प्रारूप अभिनेताओं, लेखकों और संपादकों के लिए नए अवसर तो सृजित करता है, लेकिन साथ ही कहानी कहने और अभिनय में अधिक सटीकता की मांग भी करता है।

अभिनेता उज्जवल कुमार ने बताया कि भावनात्मक रूप से जुड़ाव कहानी कहने की कला की बुनियाद बना रहता है, चाहे कहानी कितनी भी लंबी हो। उन्होंने कहा कि अभिनेताओं को नए प्रारूपों के अनुरूप ढलना होगा और कम समय में दर्शकों से जुड़ने के लिए अपने कौशल को लगातार निखारना होगा। स्मार्टफोन के व्यापक उपयोग ने माइक्रो ड्रामा को दर्शकों की बड़ी संख्‍या तक पहुंचाने के महत्वपूर्ण अवसर पैदा किए हैं।

फिल्म निर्माता राफेल स्टेम्पलेव्स्की ने माइक्रो ड्रामा को फिल्म निर्माताओं के लिए एक चुनौती और अवसर दोनों बताया। उन्होंने कहा कि सशक्त कहानी और वास्तविक मानवीय भावनाएं सिनेमा के केंद्र में रहती हैं, चाहे स्क्रीन का आकार कुछ भी हो। माइक्रो ड्रामा सिनेमाई भाषा के निरंतर विकास का एक और चरण है।

चर्चा इस आम सहमति के साथ समाप्त हुई कि माइक्रो ड्रामा सिनेमा का 'तेजी से विकसित होने वाला फैशन' नहीं है, बल्कि कहानी कहने का एक उभरता हुआ प्रारूप है जो पारंपरिक फिल्म निर्माण का पूरक है। साथ ही, दर्शकों की बदलती प्राथमिकताओं और देखने की आदतों के अनुरूप भी है।

--आईएएनएस

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