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मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी की बड़ी छापेमारी, त्रिपुरा-बंगाल-महाराष्ट्र में 13 ठिकानों पर तलाशी

अगरतला, 5 नवंबर (आईएएनएस)। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अगरतला उप-क्षेत्रीय कार्यालय ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में 13 ठिकानों पर तलाशी और जब्ती अभियान चलाया। ईडी ने यह कार्रवाई 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (पीएमएलए), 2002 की धारा 17 के तहत की।
 

अगरतला, 5 नवंबर (आईएएनएस)। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अगरतला उप-क्षेत्रीय कार्यालय ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में 13 ठिकानों पर तलाशी और जब्ती अभियान चलाया। ईडी ने यह कार्रवाई 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (पीएमएलए), 2002 की धारा 17 के तहत की।

ईडी ने आधिकारिक बयान में बताया कि यह कार्रवाई एक फर्जी सरकारी टेंडर रैकेट से जुड़ी है, जिसे उच्च शिक्षा निदेशालय नाम की एक फर्जी संस्था के जरिए चलाया जा रहा था। यह तलाशी मनी लॉन्ड्रिंग की उस जांच के सिलसिले में की गई, जो पश्चिम त्रिपुरा के कैपिटल कॉम्प्लेक्स पुलिस स्टेशन में दर्ज एक एफआईआर के आधार पर चल रही है।

यह एफआईआर नागपुर की फर्म 'एसके सेल्स कॉर्पोरेशन' की शिकायत पर दर्ज की गई थी। इसमें अभिषेक चंद्र, आईएएस (त्रिपुरा कैडर) और उनके साथियों पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने धोखाधड़ी करके इस फर्म से लगभग 14.55 करोड़ रुपए की 'अर्नेस्ट मनी डिपॉजिट' (ईएमडी) जमा करवाई।

यह रकम सितंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच त्रिपुरा सरकार के मिड-डे मील और बिजली क्षेत्र से जुड़े टेंडरों के नाम पर ली गई थी, जबकि ऐसे कोई टेंडर कभी जारी ही नहीं किए गए थे। भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत दर्ज अपराधों में आपराधिक साजिश, विश्वासघात, धोखाधड़ी, किसी और का रूप धरकर धोखा देना और जालसाजी शामिल हैं। ये पीएमएलए, 2002 के तहत अनुसूचित अपराध माने जाते हैं। इसके आधार पर ईडी ने एक ईसीआईआर दर्ज की और पीएमएलए, 2002 के तहत जांच शुरू कर दी।

जांच से पता चला है कि अभिषेक चंद्र, आईएएस, जो फिलहाल सस्पेंड हैं, ने खुद को त्रिपुरा सरकार में टेंडर प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले अधिकारी के रूप में पेश किया। उन्होंने शिकायतकर्ता का परिचय उत्पल कुमार चौधरी से कराया और बताया कि भुगतान की प्रक्रिया देखने की जिम्मेदारी उन्हीं की है।

ईएमडी का भुगतान उच्च शिक्षा निदेशालय के नाम पर डिमांड ड्राफ्ट के जरिए किया गया था। असल में यह उत्पल कुमार चौधरी की एक निजी फर्म थी, जिसका नाम असली सरकारी विभाग से मिलता-जुलता रखा गया था ताकि लोगों को धोखा दिया जा सके।

आरोप है कि इसमें फर्जी टेंडर नोटिस और वर्क ऑर्डर का इस्तेमाल किया गया। इसके साथ ही कृष्णा चक्रवर्ती, जिनका प्रतिनिधित्व उनके पति सुदीप पॉल कर रहे थे, के साथ एक जॉइंट वेंचर बनाकर पैसों की वसूली का ढांचा तैयार किया गया। पीड़ितों का भरोसा बनाए रखने और उनसे और पैसे निकलवाने के लिए कुछ खास मौकों पर उन्हें रकम का एक हिस्सा वापस भी किया गया।

आरोप है कि इस फर्जी संस्था के खातों में जमा की गई रकम को कुछ ही दिनों और कई मामलों में तो 24 घंटे के भीतर कागजी कंपनियों के एक नेटवर्क के जरिए इधर-उधर घुमा दिया गया। इनमें से कई कंपनियां उत्पल कुमार चौधरी के घरेलू कर्मचारियों और सहयोगियों के नाम पर रजिस्टर्ड थीं।

आरोप है कि इस अपराध से मिली रकम का इस्तेमाल अचल संपत्तियां खरीदने के लिए किया गया। इनमें एक हाउसिंग प्रोजेक्ट के फ्लैट और मुंबई के शिवाजी पार्क में एक रिहायशी संपत्ति शामिल है, जो अभिषेक चंद्रा के परिवार के सदस्यों के नाम पर खरीदी गई थीं। इसके अलावा, इस पैसे का इस्तेमाल विदेश यात्राओं और लग्जरी सामान खरीदने के लिए भी किया गया। इसके साथ ही आरोप है कि कोलकाता स्थित एक हवाला नेटवर्क के जरिए भी पैसों का लेन-देन किया गया।

बता दें कि ईडी पहले से ही उत्पल कुमार चौधरी और अन्य लोगों के खिलाफ जांच कर रही है। यह जांच पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में दर्ज पांच एफआईआर पर आधारित है, जिनमें इसी फर्जी संस्था और इसी तरीके का इस्तेमाल करके कई लोगों को कुल 44 करोड़ रुपए से ज्यादा का चूना लगाया गया था।

--आईएएनएस

डीके/एबीएम