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मीरा-भायंदर विवाद पर मुस्लिम निवासियों का पक्ष, कहा- सोसाइटी में बकरे लाना नई बात नहीं

मीरा भायंदर, 27 मई (आईएएनएस)। महाराष्ट्र के मीरा-भायंदर की एक सोसाइटी में बकरों को लेकर शुरू हुए विवाद पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि बकरीद के अवसर पर सोसाइटी में बकरे लाने की परंपरा नई नहीं है, बल्कि यह कई वर्षों से चली आ रही है।
 
मीरा-भायंदर विवाद पर मुस्लिम निवासियों का पक्ष, कहा- सोसाइटी में बकरे लाना नई बात नहीं

मीरा भायंदर, 27 मई (आईएएनएस)। महाराष्ट्र के मीरा-भायंदर की एक सोसाइटी में बकरों को लेकर शुरू हुए विवाद पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि बकरीद के अवसर पर सोसाइटी में बकरे लाने की परंपरा नई नहीं है, बल्कि यह कई वर्षों से चली आ रही है।

लोगों ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि इस मुद्दे को बेवजह विवाद का रूप दिया जा रहा है, जबकि पहले कभी इस तरह की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई थी। ‘पूनम क्लस्टर-1’ सोसाइटी में रहने वाले एक स्थानीय निवासी ने बताया कि वह पिछले सात वर्षों से यहां रह रहे हैं, जबकि उनके भाई लगभग दस वर्षों से इस सोसाइटी का हिस्सा हैं।

उन्होंने कहा कि सोसाइटी में हमेशा सभी धर्मों के त्योहार आपसी भाईचारे और सौहार्द के साथ मनाए जाते रहे हैं। चाहे हिंदू समुदाय का त्योहार हो, मुस्लिम समुदाय का पर्व हो या ईसाई समुदाय का कोई उत्सव, सभी लोग मिल-जुलकर कार्यक्रमों में भाग लेते आए हैं।

स्थानीय निवासी ने कहा, “अब तक कभी ऐसा माहौल नहीं बना। हर त्योहार को शांति और एकता के साथ मनाया गया है। बकरीद के दौरान भी कई वर्षों से सोसाइटी में बकरे लाए जाते रहे हैं, लेकिन पहले किसी ने इस पर आपत्ति नहीं जताई थी।”

एक अन्य मुस्लिम निवासी ने बताया कि सोसाइटी की एजीएम (वार्षिक आम बैठक) में बकरों के लिए अस्थायी शेड बनाने को पहले ही मंजूरी दी जा चुकी थी। जिस प्रकार अन्य त्योहारों के आयोजन के लिए सोसाइटी में अनुमति दी जाती है, उसी प्रकार बकरीद के अवसर पर बकरे रखने के लिए शेड बनाने की भी अनुमति दी गई थी।

उन्होंने आगे कहा, “सोसाइटी के नियमों के तहत यह निर्णय एजीएम में लिया गया था। इसमें किसी प्रकार की गोपनीयता नहीं थी। बकरों की संख्या को लेकर भी कोई विशेष प्रतिबंध तय नहीं किया गया था। हम सभी लोग नियमों का पालन करते हुए त्योहार मनाना चाहते हैं।”

मुस्लिम समुदाय के लोगों का कहना है कि इस मामले को धार्मिक विवाद के रूप में देखने के बजाय सामाजिक सौहार्द और आपसी समझदारी के साथ हल किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि सोसाइटी में वर्षों से चली आ रही परंपराओं और आपसी सहमति का सम्मान किया जाना आवश्यक है, ताकि सभी समुदाय मिल-जुलकर शांति और भाईचारे के साथ अपने त्योहार मना सकें।

--आईएएनएस

एसएके/एबीएम