निधन के बाद मिला सम्मान, भारत के पहले टेस्ट-ट्यूब बेबी के जनक डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय
नई दिल्ली, 19 जून (आईएएनएस)। भारतीय चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में 19 जून की तारीख एक अहम स्थान रखती है। यह दिन हमें उस महान वैज्ञानिक की याद दिलाता है, जिन्होंने दुनिया के सबसे बड़े चिकित्सा चमत्कारों में से एक को भारत में संभव बनाया। हालांकि, अपने जीवनकाल में उन्हें सम्मान नहीं मिला। यह कहानी है भारत के पहले टेस्ट-ट्यूब बेबी के जनक डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय की।
आज जब इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) तकनीक लाखों निसंतान दंपत्तियों के जीवन में खुशियां ला रही है, तब यह याद करना जरूरी है कि भारत में इस क्रांति की नींव रखने वाले वैज्ञानिक को अपने ही देश में मान्यता पाने के लिए मौत के बाद दो दशक से अधिक इंतजार करना पड़ा।
25 जुलाई 1978 को ब्रिटेन में वैज्ञानिक डॉ. रॉबर्ट एडवर्ड्स और डॉ. पैट्रिक स्टेप्टो के प्रयासों से दुनिया की पहली टेस्ट-ट्यूब बेबी लुईस ब्राउन का जन्म हुआ। पूरी दुनिया इस उपलब्धि से रोमांचित थी। लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि इसके केवल 67 दिन बाद कोलकाता में डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय और उनकी टीम ने आईवीएफ तकनीक के माध्यम से भारत की पहली और दुनिया की दूसरी टेस्ट-ट्यूब बेबी 'दुर्गा' के जन्म की घोषणा की। यह उपलब्धि अपने आप में असाधारण थी।
16 जनवरी 1931 को झारखंड के हजारीबाग में जन्मे डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय बचपन से ही मेधावी छात्र थे। उनके पिता डॉ. सत्येंद्र नाथ मुखर्जी प्रतिष्ठित रेडियोलॉजिस्ट थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से फिजियोलॉजी में स्नातक की पढ़ाई की और 1955 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की। प्रसूति एवं स्त्री रोग विज्ञान में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उन्हें छात्रवृत्ति और कॉलेज पदक भी मिला। इसके बाद उन्होंने प्रजनन शरीर क्रिया विज्ञान और प्रजनन अंतःस्रावी विज्ञान में दो-दो पीएचडी हासिल की।
डॉ. मुखोपाध्याय केवल आईवीएफ के प्रयोग तक सीमित नहीं थे। उनकी वैज्ञानिक सोच उस दौर की उपलब्ध तकनीकों से कहीं आगे थी। उन्होंने अंडाशय को उत्तेजित करने के लिए गोनाडोट्रोपिन आधारित तकनीकों का उपयोग किया, जो बाद में दुनियाभर में मानक उपचार का हिस्सा बनीं। सबसे उल्लेखनीय उनका भ्रूण क्रायोप्रिजर्वेशन यानी भ्रूण को सुरक्षित तरीके से फ्रीज कर बाद में उपयोग करने का प्रयोग था। यह उपलब्धि दुनिया के अन्य वैज्ञानिकों द्वारा ऐसी सफलता हासिल करने से लगभग पांच वर्ष पहले दर्ज की गई थी। आज आईवीएफ उद्योग में जो तकनीकें सामान्य मानी जाती हैं, उनमें से कई के शुरुआती प्रयोग डॉ. मुखोपाध्याय ने 1970 के दशक में ही कर लिए थे।
इतनी बड़ी सफलता के बावजूद डॉ. मुखोपाध्याय को सम्मान नहीं मिला। पश्चिम बंगाल सरकार ने उनके शोध की जांच के लिए एक समिति गठित की। विडंबना यह रही कि समिति में आईवीएफ और विशेषज्ञ शामिल नहीं थे। डॉ. मुखोपाध्याय ने अपने शोध और निष्कर्षों की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की, लेकिन समिति ने उनके दावों को अविश्वसनीय, बेतुका और फर्जी घोषित कर दिया। उन्हें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में अपने शोध प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं दी गई। उनके वैज्ञानिक कार्यों को गंभीरता से लेने के बजाय उनका उपहास उड़ाया गया। मीडिया और वैज्ञानिक समुदाय के एक वर्ग ने भी उन्हें संदेह की नजर से देखा।
वैज्ञानिक अस्वीकृति यहीं नहीं रुकी। 1980 में उनका तबादला घर से दूर आरजी कर मेडिकल कॉलेज कर दिया गया। अगले वर्ष उन्हें क्षेत्रीय नेत्र विज्ञान संस्थान भेज दिया गया, जहां उनके लिए शोध जारी रखना लगभग असंभव हो गया। लगातार अपमान, मानसिक तनाव और पेशेवर अलगाव ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और उन्हें दिल का दौरा भी पड़ा। आखिरकार 18 जून 1981 को उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। अपने अंतिम नोट में उन्होंने लिखा, "मैं हर दिन दिल का दौरा पड़ने से मरने का इंतजार नहीं कर सकता।"
डॉ. मुखोपाध्याय की मृत्यु के बाद भी वर्षों तक उनके योगदान को वह मान्यता नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे। 1997 में मुंबई के प्रजनन अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. टीसी आनंद कुमार ने उनके शोधपत्रों, दस्तावेजों और हस्तलिखित नोट्स का अध्ययन किया। गहन जांच के बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि डॉ. मुखोपाध्याय का शोध पूरी तरह वैज्ञानिक था और 'दुर्गा' वास्तव में भारत की पहली आईवीएफ बच्ची थी। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप 2002 में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने आधिकारिक रूप से डॉ. मुखोपाध्याय के योगदान को मान्यता दी।
मरणोपरांत डॉ. मुखोपाध्याय के नाम पर कई स्मृति व्याख्यान, अनुसंधान केंद्र और पुरस्कार स्थापित किए गए। 1982 में "डॉ. सुभाष मुखर्जी मेमोरियल ओरेशन" की शुरुआत हुई। 2007 में उन्हें प्रतिष्ठित डिक्शनरी ऑफ मेडिकल बायोग्राफी में स्थान मिला। 2012 में आईसीएमआर ने उनके नाम पर पुरस्कार की घोषणा की। 2020 में आईसीएमआर-राष्ट्रीय प्रजनन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान ने उनके जीवन और उपलब्धियों पर एक विशेष पुस्तक प्रकाशित की।
--आईएएनएस
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